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'बीते हुए दिन'...हिंदी सिनेमा की भूली-बिसरी यादों का झरोखा !
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“चूड़ी नहीं मेरा दिल है देखो देखो टूटे ना” – ज़ाहिदा
........शिशिर कृष्ण शर्मा
साल 1970 की, देवआनन्द की बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म ‘प्रेमपुजारी’ से एक नयी अभिनेत्री ने फ़िल्मों में कदम रखा था| नाम था, ज़ाहिदा हुसैन| हालांकि फ़िल्मों में वो भले ही नयी थीं लेकिन थीं एक प्रतिष्ठित फ़िल्मी परिवार से| उनकी दादी जद्दनबाई 1930 के दशक की एक हरफ़नमौला कलाकार थीं, वो अभिनेत्री थीं, गायिका थीं, फ़िल्म प्रोड्यूसर थीं, डायरेक्टर थीं, और संगीतकार भी थीं| ज़ाहिदा जी के पिता अख़्तर हुसैन प्रोड्यूसर-डायरेक्टर थे, चाचा अनवर हुसैन मशहूर अभिनेता थे और बुआ नरगिस अपने दौर की सुपरस्टार थीं|
ज़ाहिदा जी का इंटरव्यू मैंने अगस्त 2003 के दूसरे सप्ताह में, दक्षिण मुम्बई स्थित मालाबार हिल की अनीता बिल्डिंग के उनके फ़्लैट में किया था और ये इंटरव्यू साप्ताहिक सहारा समय के 23 अगस्त 2003 के अंक में छपा था| उनका जन्म 9 अक्टूबर 1944 को मुम्बई में हुआ था| वो कहती हैं, "मेरे पिता अख़्तर हुसैन एक फ़िल्म निर्माता थे और मां इक़बाल बेगम आम घरेलू महिला थीं| मेरे पिता ने ‘रोमियो जूलियट’ (1947) ‘दरोगाजी’ (1949) ‘बेवफ़ा’ (1952) और ‘रात और दिन’ (1967) जैसी फ़िल्में बनाई थीं| सात भाई बहनों में मैं तीसरे नंबर पर थी|
बुआ नरगिस की मैं सबसे बड़ी फैन थी| वो जब शूटिंग पर जाने से पहले अपने बड़े से ड्रेसिंग टेबल पर बैठकर मेकअप करती थीं तो मैं उन्हें बहुत गौर से देखती थी| मेरी नज़र में वो दुनिया की सबसे खूबसूरत और सबसे गरिमामयी औरत थीं| उन्हें मिलने वाला सम्मान, लोगों का प्यार और शोहरत मुझे बहुत आकर्षित किया करते थे|”
ज़ाहिदा जी थोड़ी बड़ी हुईं तो जैसा कि फ़िल्मी दुनिया का रिवाज है, फ़िल्मों से जुड़े परिवारों की लड़कियों की तरह उन्हें भी अभिनय के लिए ऑफर आने लगे| पहला ऑफर उन्हें गुरुदत्त का आया जो फिल्म ‘कनीज़’ के लिए ज़ाहिदा जी को साइन करना चाहते थे| लेकिन उस ऑफर को ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया| दरअसल गुरूदत्त की इमेज ऐसी बनी हुई थी कि नयी लड़कियों को लांच करने की अपनी घोषणा को वो अमूमन कूड़ेदान में डाल देते थे| और हुआ भी यही| ज़ाहिदा के इंकार के बाद उस फ़िल्म के लिए सिम्मी को साइन किया गया, एकाध दिन की शायद शूटिंग भी हुई और फिर वो फ़िल्म डिब्बे के हवाले कर दी गयी|
Zahida with Nargis
ज़ाहिदा जी बताती हैं, “बुआ चाहती थीं कि बजाय फ़िल्मों की तरफ़ ध्यान देने के, पहले मैं अपनी पढ़ाई पूरी करूं| और वैसे भी उन्हें पसंद नहीं था कि हमारे घर की कोई लड़की फिल्मों में काम करे| दोनों भाईयों यानि मेरे पिता और चाचा (अनवर हुसैन) से वो छोटी थीं| लेकिन घर में उनका इतना दबदबा था कि खासतौर से हम तीनों बहनों से सम्बंधित उनके फ़ैसले सभी को मान्य होते थे| निर्माता-निर्देशक एच.एस.रवेल ने साल 1961 की अपनी फ़िल्म ‘कांच की गुड़िया’ के लिए मुझे साइन करना चाहा तो बुआ की असहमति की वजह से मैं वो फ़िल्म नहीं कर सकी| कुछ सालों बाद सिनेमैटोग्राफर फली मिस्त्री द्वारा निर्मित और राज खोसला निर्देशित फ़िल्म ‘साजन की गलियां’ में मुझे देवआनंद और साधना के साथ काम करने का मौक़ा मिला| अभिनय की मेरी हार्दिक इच्छा को देखते हुए बुआ के असहमति के सुर भी धीमे पड़ गए थे| फ़िल्म में मेरा एक राजकुमारी का रोल था| लेकिन कुछ ही दिनों की शूटिंग के बाद वो फ़िल्म पता नहीं क्यों बंद हो गयी| लेकिन इस फ़िल्म में काम करने का मुझे लाभ ज़रूर मिला|”
देवआनंद जद्दनबाई के परिवार से तो परीचित थे ही, वो अब ज़ाहिदा का काम भी देख चुके थे| उन दिनों वो बतौर निर्देशक अपनी पहली फ़िल्म ‘प्रेम पुजारी’ की तैयारियों में जुटे हुए थे| फ़िल्म की मेनलीड में ख़ुद देवआनंद और वहीदा रहमान थे| इस फ़िल्म की सेकण्ड हिरोईन के लिए उन्होंने ज़ाहिदा को साइन कर लिया| साल 1970 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘प्रेम पुजारी’ के बनने में काफ़ी समय लगा था और बॉक्स ऑफिस पर भी ये फ़िल्म ठीकठाक ही चली थी| हालांकि ज़ाहिदा जी को उसी दौरान मिली कम बजट की फ़िल्म ‘अनोखी रात’ बहुत तेज़ी से बनकर ‘प्रेम पुजारी’ से दो साल पहले, साल 1968 में ही रिलीज़ होकर सुपरहिट भी हो गयी थी|
ज़ाहिदा जी बताती हैं, “फ़िल्म ‘अनोखी रात’ के निर्माता एल.बी.लक्ष्मण जब मेरे पास नायिका के रोल का ऑफ़र लेकर आए थे तो उन दिनों ‘प्रेम पुजारी’ की शूटिंग रुकी हुई थी| ‘अनोखी रात’ में संजीव कुमार और परीक्षित साहनी थे| संजीव कुमार उन दिनों बी-ग्रेड आर्टिस्ट माने जाते थे| और फिर फ़िल्म भी ब्लैक एन्ड व्हाइट थी| ऐसे में वो फ़िल्म करने का मेरा मन नहीं हुआ| लेकिन जैसे ही मुझे पता चला कि फ़िल्म की कहानी ऋषिकेश मुकर्जी की है और निर्देशक असित सेन हैं तो बिना देर किये मैंने वो फ़िल्म साइन कर ली|
Anokhi Raat
और फिर ‘गैम्बलर’ (1971), ‘तीन चोर’ (1973), ‘प्रभात (1973)’ और ‘शिकवा (1974)’ बनीं| दो अन्य फ़िल्में ‘मुस्कराहट’ और ‘औरत खड़ी बाज़ार में’ पूरी नहीं हो पायी थीं|”
ज़ाहिदा जी के हाथ से कुछ फ़िल्में निकलीं तो कुछ फ़िल्में उन्होंने ख़ुद ही ठुकरा दी थीं| ज़ाहिदा जी के अनुसार निर्माता टी.सी.दीवान अपनी एक फिल्म में उन्हें लेना चाहते थे| मौखिक तौर पर तमाम शर्तें तय हो चुकी थीं लेकिन इससे पहले कि एग्रीमेंट साइन होता, उस ज़माने की एक बड़ी हिरोईन ने जोड़तोड़ करके वो फिल्म हथिया ली| उधर ज़ाहिदा जी के पारिवारिक मित्र एफ़.सी.मेहरा अपनी फ़िल्म ‘लाल पत्थर’ में उन्हें लेने वाले थे लेकिन ज़ाहिदा जी ने शर्त रख दी कि चूंकि वो राखी गुलज़ार से सीनियर हैं इसलिए टाइटल्स में उनका नाम ऊपर आना चाहिए| नतीजतन वो फ़िल्म से बाहर हो गयीं| साउथ की एक फ़िल्म का ऑफर उन्हें इसलिए ठुकराना पड़ा क्योंकि उस फिल्म में उन्हें जानवरों के साथ काम करना था, जबकि कुत्ते-बिल्लियों के संपर्क में आते ही उन्हें एलर्जी हो जाती थी|
फ़िरोज़ ख़ान की फ़िल्म ज़ाहिदा जी ने इसलिए ठुकरा दी थी क्योंकि उन दिनों फ़िरोज़ ख़ान सी-ग्रेड स्टंट फ़िल्मों के हीरो हुआ करते थे| ऐसे में फ़िरोज़ ख़ान ने नाराज़ होकर ज़ाहिदा जी से कहा था कि तुम्हें देवआनंद के अलावा किसी और के साथ काम करना ही नहीं है|
ज़ाहिदा जी कहती हैं, “मेरे मन में भी शायद कहीं न कहीं फ़िरोज़ ख़ान की ये बात जड़ें जमाये हुए थी और शायद इसीलिये मैं लगातार बाहरी फ़िल्में ठुकराए भी जा रही थी| मेरे इस रवैये की वजह से इंडस्ट्री में मुझे ‘नकचढ़ी’, ‘घमंडी’, ‘ख़ुद को नरगिस समझती है’, ‘देव साहब के बूते पर बहुत चहकती है’ जैसे विशेषणों से नवाज़ा जाने लगा था| लेकिन देव साहब को लेकर मेरा विश्वास भी ज़्यादा नहीं टिक पाया| बी.आर.चोपड़ा जी ने साल 1972 की अपनी फ़िल्म ‘दास्तान’ में मुझे एक निगेटिव रोल के लिए साइन किया था, जिसका देव साहब ने ये कहकर विरोध किया कि ‘प्रेम पुजारी’ और ‘गैम्बलर’ के बाद वो मुझे तीसरी फ़िल्म में भी बतौर हिरोईन साइन करने जा रहे हैं और ऐसे में मेरे उस निगेटिव का रोल उनकी फिल्म पर बुरा असर पड़ेगा| मजबूरन मुझे बी.आर.चोपड़ा जी की फ़िल्म छोड़ देनी पड़ी थी| और जब देव साहब ने वो तीसरी फ़िल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ अनाउंस की तो उसमें मुझे हिरोईन नहीं बल्कि हीरो की बहन के रोल में चुना गया था| ये बात मुझे अच्छी नहीं लगी|
उधर मेरे बहनोई और ‘हम दोनों’, ‘तीन देवियां’, ‘गैम्बलर’ जैसी फिल्मों के निर्देशक अमरजीत ने भी मुझसे कह दिया था कि दर्शक तुम्हें देव साहब की हिरोईन के तौर पर देख चुके हैं और अब उनकी बहन के रोल में वो तुम्हें स्वीकार नहीं करेंगे| तुम्हारा करियर ख़त्म हो जाएगा| ऐसे में मुझे फ़िल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ छोड़ देनी पड़ी और बहन का वो रोल ज़ीनत अमान के हिस्से में आ गया| और मेरा करियर मेरे इस इंकार की वजह से समाप्त हो गया| मुझे ऑफ़र्स आने बंद हो गए|”
ज़ाहिदा जी के पिता अख्तर हुसैन के पास कई सालों से एक स्क्रिप्ट तैयार रखी थी, जिसपर वो राजकपूर और नरगिस को लेकर फ़िल्म बनाना चाहते थे लेकिन बना नहीं पाए थे| उस स्क्रिप्ट पर उन्होंने एक बार फिर से फ़िल्म बनाने का फ़ैसला किया| मेनलीड में ज़ाहिदा के साथ विनोद मेहरा और सोनिया साहनी को लिया गया, संगीत की ज़िम्मेदारी शंकर जयकिशन को दी गयी और फ़िल्म का टाइटल रखा गया, ‘नीलिमा’| साल 1975 में रिलीज़ हुई ये फ़िल्म ज़ाहिदा जी के फ़िल्मी करियर की अंतिम फ़िल्म थी, क्योंकि इस फ़िल्म के बाद ज़ाहिदा जी ने शादी करके फ़िल्मी दुनिया को अलविदा कहा और अपनी गृहस्थी संभाल ली|
दरअसल फ़िल्म ‘नीलिमा’ के फायनेंसर के.एन.(केसरीनन्दन) सहाय थे जो मुज़फ़्फ़रपुर बिहार के एक ज़मींदार परिवार से थे और अमेरिका से कैमिकल इंजीनियरिंग में डिग्री लेने के बाद कैमिकल्स के एक बड़े कारोबारी बन चुके थे| ‘नीलिमा’ की शूटिंग के दौरान सहाय जी की ज़ाहिदा जी से दोस्ती हुई जो पहले प्यार में और फिर शादी में बदल गयी थी| इस शादी से दो बेटों बृजेश और नीलेश का जन्म हुआ|
ज़ाहिदा जी के पति के.एन.सहाय का निधन साल 2020 में हुआ| उनके बड़े बेटे बृजेश फार्मास्यूटिकल्स के कारोबार में हैं और छोटे बेटे नीलेश एक फिल्म निर्माता हैं जो ‘एंजेल’ (2011) और ‘स्क्वैड’ (2021) जैसी फ़िल्में बना चुके हैं| ज़ाहिदा जी कहती हैं, “मेरे बारे में आम लोगों को ग़लतफ़हमी है कि शादी के बाद मैं मुम्बई छोड़कर बिहार में जा बसी हूं| लेकिन मैं मुम्बई में ही जन्मी, मुम्बई में ही रहकर मैंने ज़िंदगी के तमाम पड़ाव देखे और अब तो मैं दादी भी बन चुकी हूं| साईंबाबा में मेरी अगाध श्रद्धा है और उनकी भक्ति मुझे असीम शांति देती है|”
(विशेष:- इस लेख के आरम्भ में बताया गया था कि ज़ाहिदा जी की दादी जद्दनबाई 1930 के दशक की एक बहुत बड़ी फ़िल्मी हस्ती थीं| वो अभिनेत्री थीं, गायिका थीं, फ़िल्म प्रोड्यूसर थीं, डायरेक्टर थीं, और संगीतकार भी थीं| आम धारणा है कि जद्दनबाई हिंदी सिनेमा की पहली महिला संगीतकार थीं| लेकिन वास्तव में जद्दनबाई हिंदी सिनेमा की पहली नहीं बल्कि दूसरी महिला संगीतकार थीं| उन्होंने अपने बैनर, ‘संगीत फ़िल्म्स’ की साल 1935 की फ़िल्म ‘तलाशे हक़’ में संगीत दिया था| उनसे एक साल पहले, साल 1934 की फ़िल्म ‘अद्ल-ए-जहांगीर’ में इशरत सुल्ताना संगीत दे चुकी थीं जो आगे चलकर बिब्बो के नाम से एक स्टार गायिका - अभिनेत्री बनीं| एक तथ्य ये भी है कि जद्दनबाई की तीनों संतानें, अख़्तर हुसैन, अनवर हुसैन और नरगिस अलग अलग पिताओं से थे| दरअसल जद्दनबाई ने तीन शादियां की थीं| उनकी पहली शादी एक संपन्न हिन्दू व्यापारी नरोत्तमदास खत्री उर्फ़ बच्चू भाई से हुई थी जिन्होंने शादी के बाद धर्मपरिवर्तन करके इस्लाम अपना लिया था| ज़ाहिदा के पिता अख़्तर हुसैन इन्हीं बच्चू भाई के बेटे थे| जद्दनबाई के दूसरे पति उस्ताद इरशाद मीरखान एक हारमोनियम वादक थे और वो अनवर हुसैन के पिता थे| जद्दनबाई ने तीसरी शादी रावलपिंडी के एक अमीर खानदान के वारिस मोहनचंद उत्तमचंद त्यागी से की थी, जिन्होंने शादी के बाद इस्लाम अपनाते हुए अपना नाम अब्दुल राशिद रख लिया था| नरगिस इन्हीं अब्दुल राशिद की बेटी थीं|)
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(15 October 1949 - 27 August 2024) (6 July 1938 - 15 March 2025)
‘तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको’ – शुभा खोटे
...............शिशिर कृष्ण शर्मा
मुंबई के उपनगर विलेपारले (पश्चिम) का सुप्रसिद्ध जुहू बीच के इलाक़े का मिलीटरी रोड| इसी रोड पर है बीते दौर के हिन्दी सिनेमा की जानीमानी अभिनेत्री शुभा खोटे का ‘शुभांगी बंगला’| साल 2003 के अंतिम सप्ताह में मैंने इसी बंगले में साप्ताहिक ‘सहारा समय’ के अपने कॉलम ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ के लिए शुभा जी का इंटरव्यू किया था, जो 4 अक्तूबर 2003 के अंक में प्रकाशित हुआ था|
शुभा खोटे एक फ़िल्मी परिवार से थीं| उनके पिता नंदू खोटे साईलेन्ट सिनेमा के दौर से बतौर अभिनेता फ़िल्मों से जुड़े हुए थे और मराठी नाटकों के भी जाने माने अभिनेता और निर्माता-निर्देशक थे| मशहूर अभिनेत्री दुर्गा खोटे रिश्ते में शुभा जी की बुआ थीं तो उस दौर के चर्चित अभिनेता एस.बी.नायमपल्ली शुभा जी के मामा थे| मशहूर चरित्र अभिनेता और फ़िल्म ‘शोले’ के कालिया यानि विजु खोटे शुभा जी के भाई थे|
शुभा जी का जन्म 30 अगस्त 1936 को मुंबई में हुआ था| कॉन्वेंट से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने विल्सन कॉलेज में अंग्रेज़ी और फ्रेंच विषयों के साथ बी.ए. में दाखिला ले लिया था| तैराकी और साईकिलिंग शुभा जी के पसंदीदा खेल थे और उन्होंने अंतरकॉलेज तैराकी चैम्पियनशिप जीतने के साथ ही साल 1952 से 1956 तक लगातार ‘ऑलइंडिया साईकिलिंग चैम्पियनशिप’ भी जीती थी|
शुभा जी के अनुसार फ़िल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ में मूर्तिकार की भूमिका करने वाले अभिनेता कुमार की पत्नी, मशहूर अभिनेत्री और फ़िल्म निर्मात्री प्रोमिला शुभा जी से बहुत स्नेह करती थीं| वो एक अच्छी कास्टिंग डायरेक्टर के तौर पर भी जानी जाती थीं| साल 1954 में अभिनेत्री लीला चिटणिस ने फ़िल्म ‘आज की बात’ से अपने प्रोडक्शन हाउस ‘लीला चिटणिस प्रोडक्शंस’ की नींव रखी|
Leela Chitnis
‘आज की बात’ के हीरो थे लीला जी के बेटे अजीत चिटणिस, संगीतकार थे स्नेहल भाटकर| इस फ़िल्म के लिए कास्टिंग प्रमिला जी कर रही थीं| फ़िल्म की हिरोईन के रोल के लिए उन्होंने शुभा खोटे का नाम सुझाया और शुभा जी को चुन लिया गया| शुभा जी लगातार एक महीना रोज़ाना रिहर्सल के लिए लंबा फ़ासला तय करके माटुंगा स्थित लीला जी के घर जाती रहीं| लेकिन मुहूर्त से ठीक पहले उन्हें अपनी वो पहली ही फ़िल्म छोड़ देनी पड़ी क्योंकि एग्रीमेन्ट की कुछ शर्तें उनके पिता को जमी नहीं| ऐसे में शुभा जी सबकुछ भुलाकर वापस अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गयीं|
उन्हीं दिनों दीपावली की छुट्टियों के दौरान जब शुभा जी पुणे में थीं तो उन्हें एक मराठी फ़िल्म ‘शुभमंगल’ में काम करने का मौक़ा मिला| ये फ़िल्म पूरी बनने के बाद भी रिलीज़ तो नहीं हो पायी लेकिन फ़िल्मी हलकों में इसने शुभा जी को एक अभिनेत्री के तौर पर पहचान ज़रूर दे दी| उधर फ़िल्म ‘आज की बात’ साल 1955 में रिलीज़ हुई और उसमें शुभा जी की जगह चित्रा आ गई थीं|
Amey Chakravorty
शुभा जी बताती हैं, ‘जब मैंने 2 मिनट 58 सेकंड में एक मील का रिकार्ड बनाकर ‘ऑलइंडिया साईकिलिंग चैम्पियनशिप’ जीती तो ‘स्क्रीन’ ने फ़िल्म पत्रिका होते हुए भी मेरी फ़ोटो छापी, जिस पर उस ज़माने के मशहूर निर्देशक अमेय चक्रवर्ती की नज़र पड़ी| उन दिनों वो फ़िल्म ‘सीमा’ बना रहे थे| इस फ़िल्म के लिए वो एक ऐसी लड़की की तलाश में थे जो साइकिल चलाना जानती हो| उन्होंने फ़िल्म के डिस्ट्रीब्यूटर एम.बी.कामत को मुझसे मिलने के लिए भेजा| उस वक़्त मैं और भाई विजु घर में अकेले थे और जैसा कि लड़कपन में सभी भाईबहनों में होता है, हम भी लड़ाई-झगड़े में मशगूल थे| खेलों से जुड़ी होने की वजह से मेरा रहनसहन, पहनावा और तौरतरीक़े लड़कोंनुमा हुआ करते थे| मैंने दरवाज़ा खोला और कामत जी के पूछने पर कहा कि शुभांगी (मेरा असली नाम) मैं ही हूं, तो उनके चेहरे के भाव बदल गए| काफ़ी समय बाद मुझे पता चला था कि कामत जी ने वापस लौटकर अमेय चक्रवर्ती से कहा था उस लड़की में लड़कियों वाली तो कोई बात ही नहीं है और वो खासी मर्दाना लगती है| लेकिन तब भी मैं उस रोल के लिए चुन ली गयी थी| और इस तरह साल 1955 की ‘सीमा’ से मैंने फ़िल्मों में कदम रखा| इस फ़िल्म में मेरा तकिया कलाम ‘क्या बात है’ बहुत मशहूर हुआ था|’
‘सीमा’ के एक सीन में शुभा जी को साईकिल से एक उचक्के का पीछा करना था| शूटिंग के लिए खासतौर से प्रतियोगिताओं के लिए बनी फिक्सव्हील साईकिल लाई गयी| टेक में शुभा जी ने तेज़ गति से साईकिल दौड़ाई और जैसे ही ब्रेक लगाया, मुंह के बल ज़मीन पर आ गिरीं| उन्हें इतनी गंभीर चोटें आयीं कि चेहरे पर पूरे पैंतीस टांके लगाने पड़े थे| ये दुर्घटना मई 1955 में घटी थी| लेकिन शुभा जी के साथ दुर्घटनाओं का सिलसिला जारी रहा और उन्हें जीवन में कुल सात दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ा| ‘सीमा’ के अगले ही साल, अप्रैल 1956 में एक मराठी फ़िल्म की शूटिंग के दौरान जीप के ब्रेक फ़ेल हो जाने पर उनका पैर कट गया था और उसमें गैंगरीन फैल गया था| उनके साथ तीसरी बड़ी दुर्घटना साल 2000 में घटी थी जब एक टीवी शो के शूट में सीढ़ी उतरते समय उनका पैर फिसल गया| ‘सीमा’ के दौरान घटी दुर्घटना का उनके मन पर कुछ ऐसा गहरा असर था कि चेहरे को बचाने की कोशिश में हाथ में फ्रैक्चर हो गया| ऐसे में आने वाले कई एपिसोड्स की शूटिंग उन्हें प्लास्टर चढ़े हाथ के साथ करनी पड़ी थी|
Shubha khote with Mehmood & Dhumal
शुभा जी बताती हैं, ‘अमेय चक्रवर्ती कहते थे कि मैं कॉमेडी बहुत अच्छी करती हूं| ‘सीमा’ के बाद मैंने उनकी फ़िल्म ‘देख कबीरा रोया’ में भी काम किया था| लेकिन साल 1957 में अचानक ही उनकी मृत्यु हो गयी थी| उसके बाद मैंने ‘पेइंग गेस्ट’, ‘मुजरिम’, ‘अनाड़ी’, ‘सांझ और सवेरा’, ‘बरखा’, ‘दीदी’ जैसी कई फ़िल्मों में काम किया और इनमें से लगभग सभी फिल्में हिट रहीं| फ़िल्म ‘चंपाकली’ में मैंने टाइटल रोल किया था| ‘दीदी’, ‘पिकनिक’, ‘हीरामोती’, ‘रोड नं.303 जैसी छह सात फिल्में मैंने बतौर हिरोईन कीं| फ़िल्म ‘पेइंग गेस्ट’ मैंने देखी ही नहीं क्योंकि इसमें मेरा रोल खलनायिका का था, जो करना मुझे अच्छा नहीं लगा था| साल 1959 की फ़िल्म ‘छोटी बहन’ से मेरी पहचान एक हास्य अभिनेत्री की बन गयी| महमूद और धूमल के साथ मेरी तिगड़ी खूब जमी| उस दौर में मैंने ‘ससुराल’, ‘हमराही’, ‘बेटी बेटे’, ‘दिल तेरा दीवाना’, ‘भरोसा’, ‘गोदान’, ‘घराना’, ‘ज़िद्दी’, ‘लव इन टोक्यो’ जैसी कई फ़िल्में कीं| ‘हमसे आया न गया’, ‘तुम मुझे भूल भी जाओ’, ‘तड़पाओगे तड़पा लो’, ‘मैं रंगीला प्यार का राही’, ‘वो दिन याद करो, ‘सलामे हसरत कुबूल कर लो’, ‘अजहूं न आये बालमा’, ‘जाऊंगी ससुराल दुल्हन बन के’ जैसे मुझ पर फ़िल्माए गये सभी गीत भी हिट रहे|’
Shubha Khote with Husband
21 जनवरी 1964 को शुभा खोटे का विवाह हुआ| उनके पति दिनेश एम. बलसावर बर्मा शैल में उच्चाधिकारी थे| लेकिन शुभा की मां लीला खोटे बेटी के इस प्रेमविवाह के पूरी तरह खिलाफ़ थीं| इसका शायद एक कारण तो ये था कि उस समय शुभा अपने करियर की ऊंचाईयों पर थीं, और दूसरा, दिनेश पहले से विवाहित और दो बेटों का पिता थे, हालांकि उनकी पत्नी का निधन हो चुका था| मां का ये गुस्सा शुभा की बेटी के जन्म के बाद ही कुछ कम हुआ था|
शुभा जी का कहना था, “विवाह के बाद लोगों ने बिना मुझसे बात किये खुद ही धारणा बना ली कि मैं फिल्मों से अलग हो चुकी हूं| ऐसे में स्वाभाविक रूप से मेरे पास काम कम होता चला गया| हालांकि उस दौरान साल 1968 में मैं निर्माता और निर्देशक भी बन गयी और वो फ़िल्म थी, मराठी भाषा की ‘चिमुकला पाहुना’| और फिर 1970 के दशक के मध्य में मेरे पति का ट्रांसफर लंदन हुआ तो मैं भी उनके साथ चली गयी| और इस तरह फ़िल्मों से मेरा रिश्ता, भले की कुछ समय के लिए ही सही, पूरी तरह टूट गया|
कुछ सालों बाद हम भारत वापस लौटे तो मुझे फ़िल्मों में धमाकेदार कमबैक करने का सुनहरा मौक़ा मिला| मेरी वो कमबैक फ़िल्म थी, साल 1981 की ब्लॉकबस्टर, ‘एक दूजे के लिए’| मैंने इस फ़िल्म में नायिका रति अग्निहोत्री की मां का रोल किया था, जो निगेटिव होने के साथ साथ कॉमिकल कहीं ज्यादा था|”
करियर के इस नये दौर में शुभा जी ने ‘नसीब’, ‘कुली’, ‘जुनून’, ‘किशन कन्हैया’, ‘कोयला’ और ‘मैं प्रेम की दीवानी हूं’ जैसी फ़िल्मों के अलावा ‘ज़बान संभाल के’, ‘बा बहू और बेबी’ और ‘खट्टा मीठा’ जैसे टीवी शोज़ में भी काम किया| साथ ही शुभा जी रंगमंच पर भी सक्रिय रहीं और देश-विदेश में होने वाले हिन्दी और अंग्रेज़ी नाटकों के मंचन में लगातार हिस्सा लेती रहीं|
Bhawana Balsawar
शुभा खोटे के बड़े बेटे परमानन्द अमेरिका में रहते हैं और छोटे बेटे अश्विन फ़िल्मों में साउन्ड रेकॉर्डिस्ट हैं| उनकी बेटी भावना बलसावर भी टीवी शोज़ की एक जानीमानी अभिनेत्री हैं| शुभा जी के पति दिनेश एम. बलसावर अब इस दुनिया में नहीं हैं|
आने वाली 30 अगस्त 2025 को शुभा खोटे 89 साल की होने जा रही हैं|
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“आ के दर्द जवां है, सजना हाए, रात का इशारा है” – अहमद वसी
…..शिशिर कृष्ण शर्मा
अहमद वसी! वो इकलौते गीतकार, जिन्हें संगीतकार ओ.पी.नैयर ने ब्रेक दिया था| लेकिन इस तथ्य की ओर मुझ जैसे नैयर साहब के घोर प्रशंसकों का भी शायद कभी ध्यान नहीं गया| दरअसल नैयर साहब ने अपनी कुल 78 फ़िल्मों में जितने भी गीतकारों के साथ काम किया वो सभी पहले से फिल्मों में लिखते आ रहे थे| अपवाद थे तो अहमद वसी, जिन्होंने नैयर साहब की साल 1973 की म्यूज़िकल हिट फ़िल्म 'प्राण जाये पर वचन न जाए' के कुल छः में से एक गीत 'आ के दर्द जवां है, सजना हाए, रात का इशारा है' लिखकर फ़िल्मों में कदम रखा था|
अहमद वसी जी का जन्म 8 अक्टूबर 1943 को सीतापुर - उत्तरप्रदेश के मौहल्ला कज़ियारा के एक प्रतिष्ठित शिया परिवार में हुआ था| उनके पूर्वज मूल रूप से ईरान के रहने वाले थे, जिन्होंने भारत आकर शुरूआत में बाराबंकी के सैदपुर में डेरा डाला और फिर सीतापुर चले आये| चूंकि वो काज़ी थे इसलिए सीतापुर आकर जिस जगह को उन्होंने आबाद किया, वो जगह मौहल्ला कज़ियारा कहलायी| मौहल्ला कज़ियारा का अहमद वसी जी का पुश्तैनी घर बड़े इमामबाड़ा के सामने है और घर के ठीक पीछे ख़ानदान के उन्हीं पूर्वज की क़ब्र| अहमद वसी जी कहते हैं, "आज भी जब हमारे परिवारों में शादी-ब्याह जैसा कोई शुभ काम होता है तो सबसे पहले उस क़ब्र पर गुलगुले चढ़ाकर और शमां जलाकर उन बुज़ुर्ग का आशीर्वाद मांगा जाता है|”
अहमद वसी जी का पूरा नाम सैयद अहमद वसी रिज़वी है| उनकी स्कूली पढ़ाई सीतापुर के गवर्नमेंट हाई स्कूल से हुई, जिसमें जोश मलीहाबादी भी पढ़े थे| और फिर उन्होंने राजा इंटरमीडिएट कॉलेज से 11वीं-12वीं करने के बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी से बी.ए. एल.एल.बी. किया|
अहमद वसी जी के पिता मोहम्मद अतहर महमूदाबाद रियासत के मैनेजर थे, पढ़ने-लिखने का शौक़ रखते थे और एक बेहतरीन शायर भी थे| वो बचपन में ही घरवालों के साथ कर्बला की ज़ियारत कर आये थे और अदब की दुनिया में 'ज़ायर सीतापुरी' के नाम से जाने जाते थे| ज़ायर शब्द उन्होंने 'ज़ियारत' से लिया था| मोहम्मद अतहर अपनी धार्मिक शायरी के लिए मशहूर थे और उन्होंने जदीद अर्थात नये मर्सिये का चलन शुरू किया था| पुराना मूल मर्सिया जहां कर्बला के ग़म को, मातम और आंसुओं को लेकर लिखा जाता था, वहीं जदीद मर्सिया में कर्बला से सामाजिक समस्याओं को भी जोड़ा गया था| कहा जाता है कि जदीद मर्सिये की बुनियाद जोश मलीहाबादी ने रखी थी|
3 बहनों और 5 भाईयों में अहमद वसी सबसे बड़े थे| दुर्भाग्य से उनके सभी बहन भाई अब इस दुनिया से जा चुके हैं, जिसका ग़म और दर्द बड़े भाई की बातों में छलक ही जाता है|
Shahid Raza
अहमद वसी साहब की अम्मी क़मर बानो संडीला-हरदोई की थीं| नाना पुलिस की नौकरी में थे, वो ट्रांसफ़र पर सीतापुर आए तो वहीं उन्होंने बेटी की शादी भी कर दी थी| अहमद वसी साहब के चाचा नादिम सीतापुरी भी एक नामी शायर थे| उन्होंने इंक़लाब जैसे कई बड़े अखबारों में काम किया और लगातार छपते भी रहे| अहमद वसी पर चाचा का बहुत प्रभाव था| चाचा को देख और पढ़पढ़कर अहमद वसी ने भी स्कूल के ज़माने से ही लिखना शुरू कर दिया था|
अहमद वसी कहते हैं, "मुहर्रम की मजलिसों में पढ़ने को कहा जाता था, तो मेरी कोशिश रहती थी कि मैं अपना ही लिखा हुआ पढूं| मैं हाथ का लिखा पर्चा 'फूल' निकालता था, जिसे ख़ानदान में सभी लोग पढ़ते थे| उधर सीतापुर में मैं रंगमंच से भी जुड़ गया था| मैं नाटक लिखता था, डायरेक्ट करता था इस इस मुहिम में मेरा साथ देते थे मेरे दोस्त और सीतापुर के जुनूनी रंगकर्मी शाहिद रज़ा, जो स्टेज बनाने से लेकर मेरे साथ कुर्सियां-दरियां उठाने तक का काम पूरे जोशोखरोश से करते थे| शाहिद रज़ा एक बेहतरीन कॉमेडियन थे, जिनके मंच पर आते ही दर्शक ठहाके लगाने लगते थे| शाहिद रज़ा अब दिल्ली में रहते हैं और ईरान कल्चरल हाउस से जुड़े हुए हैं|”
अहमद वसी लगातार लिख रहे थे| उनकी रचनाएं पकिस्तान की पत्रिकाओं में भी छपने लगी थीं| लखनऊ रेडियो पर उनके लिखे नाटक प्रसारित हो रहे थे| लखनऊ शहर और यूनिवर्सिटी में उनका नाम हो गया| 24 - 25 साल की उम्र में उनकी ख़ासी पहचान बन गयी थी| और इसी वजह से उनकी मुहब्बत भी परवान चढ़ी|
अहमद वसी कहते हैं, "वो काफ़ी पढ़ीलिखी थीं और टीचर थीं| आगे चलकर एक इंटर कॉलेज की प्रिंसिपल बनीं| लेकिन शादी के लिए उनके मां-बाप तैयार नहीं हुए क्योंकि मेरे पास नौकरी नहीं थी| इस झटके और ग़म ने भी मेरी शायरी को काफ़ी निखारा| मुझे बचपन से ही गाने सुनने का बहुत शौक़ था| ननिहाल में भोंपूवाला ग्रामोफोन था, जिसपर बजने वाले लाख के रिकार्ड्स मुझे बहुत आकर्षित करते थे| बड़ा हुआ तो ये शौक़ और भी ज़ोर पकड़ता चला गया| लखनऊ में कॉलेज के दौरान होटलों में ज्यूकबॉक्स में पैसे डाल-डालकर रिकार्ड्स पर गाने सुनता था|”
लखनऊ में सीतापुर के रहने वाले अहमद वसी के हमउम्र और छोटेबड़े तमाम लोगों का एक ग्रुप बन गया था| वो सब साथ में सिनेमा देखने जाते थे| एक रोज़ वो फ़िल्म 'नया दौर' देखने गए, जिसमें अहमद वसी जी के पसंदीदा दिलीप कुमार, साहिर और ओ.पी.नैयर की तिगडी पहली बार एक साथ काम कर रही थी| अहमद वसी कहते हैं, "फ़िल्म शुरू हुई| टाइटल्स में साहिर का नाम आया तो मेरे मुंह से बेसाख्ता निकल पड़ा, 'एक रोज़ मेरा नाम भी इसी तरह स्क्रीन पर आएगा!’ ये सुनकर सभी साथी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगे| फ़िल्म देखकर वापस लौटे तो साथियों ने कहा, ‘बहुत उड़ने लगे हो| छपना अलग बात है, लेकिन फ़िल्मों के लिए लिखना?’ मैंने जवाब दिया, ‘एक रोज़ लिख के दिखा दूंगा| ज़्यादा बोलोगे तो ओ.पी.नैयर के साथ भी लिख के दिखा दूंगा| जो हारे, वो जीतने वाले को बस पिक्चर दिखा दे, वो भी नया दौर|”
उन्हीं दिनों, साल 1966 में अचानक ही अहमद वसी जी के पिता का निधन हो गया| उधर माशूका की भी शादी हो गयी| अहमद वसी कहते हैं, "मैं घर में बड़ा| ऊपर से बेकारी| लखनऊ काटने को दौड़ता सा महसूस होने लगा|
‘लखनऊ जो मेरा शहर-ए-आरज़ू था, वीराना लगने लगा| दिल ने कहा, यहां से कहीं और चल|’
सोचा बंबई चलो, जहां मेरे एक चाचा रहते थे|”
अहमद वसी 'ऑल इण्डिया रेडियो' लखनऊ जाकर ड्रामा प्रोड्यूसर कुमुद नागर से मिले| कुमुद जी सुप्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार अमृतलाल नागर के बेटे और फ़िल्म लेखिका अचला नागर के भाई थे| अहमद वसी कहते हैं "नागर जी ने कहा, मुम्बई में मेरे उस्ताद मुख्तार अहमद जी हैं जो विविध भारती में हवामहल पेश करते हैं| उनसे मिलना, मेरा नाम ही काफ़ी है|”
साल 1967 के फ़रवरी माह में अहमद वसी मुम्बई पहुंचे| उनके चाचा कुर्ला में रहते थे और किताबों के कारोबारी थे| अहमद वसी ने उनके यहां डेरा डाला| फिर वो विविध भारती पहुंचे| मुख्तार अहमद जी से मिले तो उन्होंने उसी दिन हवा महल लिखने को दे दिया| अहमद वसी ने ड्रामा 'ख़ाली मकान' लिखा| उनकी मुलाक़ात 'ऑल इण्डिया रेडियो' की उर्दू सर्विस के मुमताज़ बसीर साहब से हुई, जो लखनऊ के रहने वाले थे| उनसे जानपहचान हो गयी|
अहमद वसी कहते हैं, "एक रोज़ मुमताज़ बसीर साहब ने मुझे अपने ऑफ़िस में बुलाकर कहा कि विविध भारती में प्रोग्राम कॉम्पियर की जगह निकलने वाली है, एप्लाई कर दो, लेकिन मेरा नाम नहीं आना चाहिए| मैंने एप्लाई किया| अब तक मेरा जो कुछ छपा था, इंटरव्यू में मैं उसकी कटिंग्स का पुलिंदा और तमाम सर्टिफिकेट्स लेकर पहुंचा| स्टेशन डायरेक्टर दीक्षित जी के असिस्टेंट रोशनअली मूलजी मुझे पढ़ते आये थे| उन्होंने दीक्षित जी को मेरा लिखा पढ़कर सुनाया, जिसमें हवा महल का मेरा ड्रामा भी शामिल था| और इस तरह मुझे नौकरी के लिए चुन लिया गया|”
अहमद वसी जी ने अक्टूबर 1967 में विविध भारती की नौकरी ज्वाइन की थी| उनका काम रेडियो कार्यक्रमों की स्क्रिप्ट लिखना था| आगे चलकर वो अनाऊंसर की ज़िम्मेदारी भी संभालने लगे| विविध भारती के वरिष्ठ अनाऊंसर शील वर्मा आशा भोंसले के मुंहबोले भाई थे और ओ.पी.नैयर से भी उनकी गहरी दोस्ती थी| एक रोज़ शील वर्मा के ज़रिये अहमद वसी जी ओ.पी.नैयर के संपर्क में आये और फिर उनका मिलना-जुलना होने लगा|
अहमद वसी बताते हैं, “नैयर साहब अक्सर शाम के समय मुझे और आशा भोंसले को साथ लेकर गाड़ी में घूमने निकल जाते थे| रात का खाना भी मैं उन्हीं के साथ बाहर ही खाता था| एक रोज़ मैंने उन्हें लखनऊ का वो क़िस्सा सुनाया जब फिल्म 'नया दौर' के टाइटल्स देखकर मेरे मुंह से निकल पड़ा था कि 'एक रोज़ मेरा नाम भी इसी तरह स्क्रीन पर आएगा!’ और ‘ज़्यादा बोलोगे तो ओ.पी.नैयर के साथ भी लिख के दिखा दूंगा| ये सुनकर नैयर साहब हंसने लगे, और फिर ख़ामोश हो गए| बहरहाल हमारा मिलना-जुलना बदस्तूर जारी रहा|”
5-7 महीने बाद एक रोज़ अहमद वसी जी को नैयर साहब ने फ़ोन करके शारदा बिल्डिंग, ए-रोड, चर्चगेट के अपने घर पर आने को कहा| अहमद वसी नैयर साहब से मिलने पहुंचे| नैयर साहब ने उनसे कहा कि मैंने एक तस्वीर साईन की है| तुम्हें ट्रायल के लिए एक गीत दूंगा, जिसका पहला लफ्ज़ 'आ' होना चाहिए| सिंगर का मुंह खुलना चाहिए|
(नैयर साहब फ़िल्म या पिक्चर के बजाय तस्वीर शब्द का इस्तेमाल करते थे, और ये मेरा अर्थात शिशिर कृष्ण शर्मा का भी निजी अनुभव है)|
अहमद वसी बताते हैं, “मैंने रात भर जागकर 96 मुखड़े लिखे| अगले दिन तमाम मुखड़े लेकर नैयर साहब के पास गया तो वो कन्फ्यूज़ हो गए| उन्होंने मुझे फ़िल्म के निर्देशक और जानेमाने लेखक अली रज़ा साहब के पास भेज दिया| अली रज़ा साहब ने कहा कि मुखड़े फाइनल करना तो संगीतकार का काम है| लेकिन मेरे ये कहने पर कि नैयर साहब ने ही मुझे आपके पास भेजा है, अली रज़ा साहब ने दो-तीन मुखड़े चुन लिए| बातचीत के दौरान उन्होंने मुझसे मेरे घर और ख़ानदान के बारे में पूछा तो पता चला वो मेरे चाचा हैदर असद के दोस्त थे और दोनों लखनऊ के 'शिया कॉलेज' में साथ पढ़ते थे| बहरहाल नैयर साहब ने उन दो तीन मुखड़ों में से 'आ के दर्द जवां है' को चुना| उस फ़िल्म, यानी 'प्राण जाये पर वचन न जाये' का मुहूर्त आशा भोंसले के गाये इसी गीत से हुआ था, जिसका क्लैप अली रज़ा साहब की पत्नी, अभिनेत्री निम्मी ने दिया था|”
अहमद वसी का ये पहला ही गीत सुपरडुपर हिट हुआ| उसी साल यानी 1973 की ही फ़िल्म 'टैक्सी ड्राईवर' में भी ओ.पी.नैयर ने अहमद वसी को एक गीत लिखने को दिया| आशा भोंसले का ही गाया वो गीत 'बालम हरजाई, जा मैं तो आंख मिला पछतायी' भी हिट हुआ था| और फिर आयी साल 1978 की 'हीरामोती'| नैयर साहब ने इस फ़िल्म के सभी 6 गीत लिखने की ज़िम्मेदारी अहमद वसी जी को दी| इस फ़िल्म के सभी गीत हिट हुए थे, जिनमें मोहम्मद रफ़ी और दिलराज कौर के गाये डुएट 'होंठ हैं तेरे दो लाल हीरे, इन्हें खोलना तू धीरे धीरे' को आम लोगों ने ख़ासतौर से पसंद किया था| अहमद वसी के अनुसार इस फ़िल्म में मोहम्मद रफ़ी, मन्नाडे और दिलराज कौर की गायी, ‘ज़िंदगी लेकर हथेली पर दीवाने आ गए, तीर खाने के लिए बनकर निशाने आ गए' ओ.पी.नैयर द्वारा अपने पूरे करियर में संगीतबद्ध की गयी एकमात्र क़व्वाली थी|
इसके बाद नैयर साहब के पास लगभग 12 सालों तक काम नहीं रहा| और फिर 1990 के दशक की शुरूआत में उन्हें एक साथ 3 फ़िल्में मिलीं, ‘जानम तेरे लिए', ‘निश्चय' और 'ज़िद'| ‘जानम तेरे लिए' के लिए अहमद वसी ने दो गीत लिखे| अनुराधा पोडवाल का गाया सोलो ‘मैं मिलूंगी तुझको राधा कभी मीरा बनकर' और अनुराधा पोडवाल और शब्बीर कुमार का गाया टाइटल सांग ‘कुरता सिलाया रंगदार, ओ जानम तेरे लिए'| बाद में इस फ़िल्म का टाइटल 'जानम तेरे लिए' से बदलकर 'दिल तेरे हवाले' कर दिया गया था, लेकिन ये फ़िल्म बन ही नहीं पायी| फिल्म के लिए रिकॉर्ड किये गए 7 गीत भी रिलीज़ नहीं हुए|
(विशेष टिप्पणी:- इस फ़िल्म के साथ महत्वपूर्ण रूप से जुड़े एक मित्र ने रिकॉर्डिंग के दौरान ये सातों दुर्लभ गीत अपने लिए एक ऑडियो कैसेट में ट्रांसफ़र कर लिये थे| उन्होंने मेरे नैयर प्रेम को देखते हुए वो सभी गीत मुझे भी दिए| आज ये गीत मेरे संग्रह का एक अहम हिस्सा हैं|)
साल 1981 की फ़िल्म 'क़ानून और मुजरिम' में अहमद वसी का लिखा एक गीत आज भी अक्सर बजता और बेहद चाव से सुना जाता है| और वो है, सी.अर्जुन के संगीत में सुरेश वाडकर और उषा मंगेशकर का गाया डुएट 'शाम रंगीन हुई है तेरे आंचल की तरह, सुरमई रंग सजा है तेरे काजल की तरह’|
साल 1987 की फ़िल्म 'वली-ए-आज़म' में अहमद वसी जी का लिखा और चित्रगुप्त के संगीत में तलत महमूद और हेमलता का गाया 'मेरे शरीक़े सफ़र अब तेरा ख़ुदा हाफ़िज़' भी अपने दौर का एक हिट गीत था| ये गीत इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि तलत महमूद का गाया और रिकॉर्ड कराया गया ये आख़िरी गीत है|
Lekh Tondon
अहमद वसी जी की अब तक की आख़िरी फ़िल्म साल 2019 की 'फिर उसी मोड़ पर' है| इस फ़िल्म के निर्माता और संगीतकार त्रिनेत्र वाजपेयी और निर्देशक लेख टंडन थे| 'प्रोफ़ेसर', 'आम्रपाली', 'झुक गया आसमान', 'प्रिंस' और 'दुल्हन वोही जो पिया मन भाये' जैसी फ़िल्मों के निर्देशक लेख टंडन साहब की भी ये आख़िरी फ़िल्म थी, जो उनके निधन के दो साल बाद रिलीज़ हुई थी|
अहमद वसी विविध भारती की नौकरी से साल 2003 में रिटायर हुए थे| उनके परिवार में पत्नी और दो विवाहित बेटे हैं| बड़े बेटे वसी हुसैन ज़ायर उर्फ़ पैकर मुम्बई विश्वविद्यालय से एम.कॉम.,एम.लिब. करने के बाद अब सीतापुर के रिजेंसी डिग्री कॉलेज में लाइब्रेरियन के पद पर कार्यरत हैं| छोटे बेटे वसी अकील ज़ायर उर्फ़ नैयर सी.ए. हैं और मस्कट में रहते हैं| बड़े बेटे से अहमद वसी जी की की दो पोतियां हैं और छोटे से एक पोती और एक पोता|
Wasi Family
अहमद वसी जी ने बच्चों के लिए भी बहुत कुछ लिखा| वो बताते हैं, "दिल्लीप्रेस की बालपत्रिका 'खिलौना' में साल 1962 से मैं लगातार छपता रहा| 1960 के दशक में दुनिया के पहले अंतरिक्षयात्री, रूस के यूरी गगारिन लखनऊ आए तो बच्चों और हम छात्रों को उनके स्वागत के लिए अमौसी हवाईअड्डे पर ले जाया गया, जहां मेरी नज़्म 'हम चन्दा देस में जाएंगे' फ़्रेम कराकर उन्हें भेंट की गयी थी|“
अहमद वसी का लेखन आज भी उसी ऊर्जा के साथ जारी है| उनकी शायरी और ग़ज़लों-नज़्मों की अभी तक 10 से ज़्यादा किताबें छप चुकी हैं| साल 2023 में उनका किसान पर काव्य में लिखा ड्रामा 'धरती के लाल' और ग़ज़लों-नज़्मों की किताब 'काग़ज़ नम रहा' बाज़ार में आयी और सराही गयी| मुम्बई विश्वविद्यालय से उन पर एक छात्र मोहम्मद मेराज़ ने एम.फ़िल. किया|
हिन्दी ग़ज़लों की अहमद वसी की किताब 'बादलों के शहर' का जया रॉयचौधरी द्वारा अंग्रेज़ी में अनुवाद किया गया, तो उनकी चुनींदा ग़ज़लों का मनीषा पटवर्धन द्वारा किया गया मराठी अनुवाद, किताब के रूप में बाज़ार में आया| उधर अहमद वसी जी के चुनींदा शेरों और ग़ज़लों के शबनम गोरखपुरी द्वारा किये गये अंग्रेज़ी अनुवाद की भी एक किताब हाल ही में प्रकाशित हुई है|
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Mr. Harish Raghuvanshi (Surat) & Mr. Harmandir Singh ‘Hamraz’ (Kanpur) for their valuable suggestion, guidance, and support.
Dr. Ravinder Kumar (NOIDA) for the English translation of the write up.
Mr. S.M.M.Ausaja (Mumbai) for providing movies’ posters.
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“लपक झपक तू आ रे बदरवा, सर की खेती सूख रही है" - भूडो आडवाणी
.......शिशिर कृष्ण शर्मा
हिन्दी फ़िल्मों में ऐसे कई अभिनेता हुए जो परदे पर लगातार नज़र आते रहे, उनका चेहरा बेहद जाना-पहचाना था, लेकिन वो कौन थे, उनका नाम क्या था, वो कहां से आए थे, कहां चले गये, जैसे सवाल अपने पीछे छोड़कर वो हमेशा के लिए गुमनामी में खो गये| 'बीते हुए दिन' ऐसे ही भूलेबिसरे कलाकारों की तलाश में जुटा रहा, आज भी जुटा हुआ है और आने वाले समय में भी अपनी इस मुहिम को यथासंभव जारी रखेगा|
इन्हीं जाने-पहचाने चेहरे वाले अनजाने कलाकारों में शामिल थे भूडो आडवाणी| एक बेहद आम सा, जाना-पहचाना चेहरा| लेकिन औरों से थोड़ा अलग| पतला दुबला शरीर, मुंह में दांत नहीं, सर के बाल लगभग उड़े हुए| किशोरावस्था में भी बूढ़े नज़र आने वाले| उनके बारे में आम धारणा थी कि फ़िल्मों में एक्टिंग के लिए उन्होंने अपने दांत निकलवा दिए थे|
"नहीं! ये धारणा ग़लत है| दरअसल उनके दांत पूरी तरह विकसित नहीं हो पाए थे, जिससे उन्हें तक़लीफ़ होती थी| असली दांत निकलवाकर डेन्चर लगवाए, लेकिन उन नक़ली दांतों से उनकी परेशानी और भी बढ़ गयी थी| इसलिए उन्होंने बिना दांतों के ही रहना बेहतर समझा|” - ये बात हाल ही में हुई एक मुलाक़ात के दौरान भूडो आडवाणी के बेटे रमेश आडवाणी जी ने बताई थी|
Shri Ramesh Advani
भूडो आडवाणी को मैं ब्लैक एंड व्हाईट के ज़माने की कई पुरानी फ़िल्मों में देख चुका था| राजकपूर की फ़िल्म 'बूटपॉलिश' के कॉमेडी गीत 'लपक झपक तू आ रे बदरवा, सर की खेती सूख रही है" में उनके अभिनय ने मुझे ख़ासा प्रभावित किया था| फ़िल्मी पत्र-पत्रिकाओं के ज़रिये उनका नाम भी पता चल चुका था| लेकिन 1930 के दशक से फिल्मों में काम कर रहे उन जैसे कलाकार के, 7-8 दशकों बाद तक जीवित रहने की संभावना न के बराबर थी| ऐसे में सवाल था कि उनके बारे में बातचीत करूं भी तो किससे?
मेरी ये समस्या एक रोज़ तब सुलझ गयी, जब ‘बीते हुए दिन' के निकट सहयोगी, वरिष्ठ फ़िल्म इतिहासकार, और पुस्तक 'Forgotten Artistes Of Early Cinema and The Same Name Confusion' के लेखक, मुम्बई निवासी श्री अरूणकुमार देशमुख जी ने बताया कि भूडो आडवाणी के बेटे रमेश आडवाणी जी का फ्लैट उन्हीं की बिल्डिंग में है, पत्नी के निधन के बाद पिछले कुछ सालों से वो अपने बेटे के पास बंगलौर में रहते हैं, लेकिन साल में एकाध महीने के लिए मुम्बई भी आते हैं|
अरूणकुमार देशमुख जी के ज़रिये मेरा संपर्क रमेश आडवाणी जी से हुआ और अक्टूबर 2023 में जब वो बेटे विनोद आडवाणी के साथ कुछ दिनों के लिए मुम्बई आए, तो अंधेरी (पश्चिम) के सात बंगला बस डिपो के पास स्थित उनके फ्लैट में भूडो आडवाणी के बारे में पिता-पुत्र से अंततः मेरी बातचीत संपन्न हो ही गयी|
भूडो आडवाणी का जन्म 17 अगस्त 1905 को हैदराबाद–सिंध में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है| उनके पिता कुंदनमल आडवाणी पुलिस इंस्पेक्टर थे और मां उत्तमबाई एक आम गृहिणी| 4 बहनों और 6 भाईयों में भूडो सबसे बड़े थे| उनकी पढ़ाई-लिखाई हैदराबाद में ही हुई| 10 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार स्कूल के एक अंग्रेज़ी नाटक में अभिनय किया था|
सिंधी रंगमंच की मशहूर हस्ती हेमनदास गंगादास ने वो नाटक देखा था और भूडो के अभिनय से वो बेहद प्रभावित भी हुए थे| उधर भूडो मैट्रिक में फ़ेल हो गए तो उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी| ऐसे में हेमनदास ने उन्हें अपनी नाटक कंपनी में शामिल कर लिया| और यहां से भूडो का, नाटकों का सिलसिला शुरू हो गया| वो अक्सर महिलाओं की भूमिका में नज़र आते थे, लोग उनके अभिनय को बहुत पसंद करते थे और उस ज़माने की तमाम नाटक कम्पनियां उन्हें अपने नाटकों में लेने को बेताब रहती थीं|
उन्हीं दिनों भूडो ने नवलराम हीराचंद एकेडमी के नाटक 'हरीफ़' में एक बूढ़े की भूमिका की| लोगों को वो भूमिका इतनी पसंद आयी कि भूडो को, जिनका असली नाम दौलतराम आडवाणी था, लोग 'बुड्ढो' अर्थात 'बूढ़ा' आडवाणी कहने लगे| और यही 'बुड्ढो' आगे चलकर 'भूडो' आडवाणी हो गया| उसी दौरान आडवाणी परिवार हैदराबाद से कराची शिफ्ट हो गया था|
भूडो लगातार नाटकों में काम करते रहे| उनके नाटक सामाजिक समस्याओं और कुरीतियों पर प्रहार करने वाले होते थे| उन्हें जे.बी.आडवाणी एंड कंपनी में 40 रूपया प्रतिमाह के वेतन पर मैनेजर की नौकरी भी मिल गयी थी, जो उस ज़माने में अच्छी ख़ासी रकम हुआ करती थी| लेकिन नाटकों के शोज़ के लिए अक्सर ऑफ़िस से ग़ायब रहने की वजह से जल्द ही वो नौकरी उनके हाथ से निकल गयी| ऐसे में उनके एक प्रशंसक ने उन्हें कराची इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कारपोरेशन में नौकरी दिला दी|
भूडो को नौकरी करते एक महीना भी नहीं हुआ था कि साल 1933 में एक दोस्त के बुलावे वो इस्तीफ़ा देकर मुम्बई चले आए| यहां आकर वो अजन्ता सिनेटोन के मालिक, निर्माता-निर्देशक मोहन भवनानी से मिले| मोहन भवनानी भी सिंधी थे और हैदराबाद-सिंध के रहने वाले थे| उन्होंने भूडो को ब्रेक दिया और इस तरह अजन्ता सिनेटोन की साल 1933 की फ़िल्म 'अफ़ज़ल उर्फ़ हूरे हरम’ में एक छोटे से रोल से भूडो आडवाणी ने फ़िल्मों में कदम रखा| आगे चलकर उन्होंने अजन्ता सिनेटोन की 'दर्दे दिल' 'दुख्तरे हिन्द', 'द मिल', ‘सैर ए परिस्तान', ‘प्यार की मार' और 'शेरदिल औरत' जैसी 11 और फ़िल्मों में काम किया|
साल 1934 में अजन्ता सिनेटोन बंद हुआ तो निर्माता चिमनलाल देसाई के बुलावे पर भूडो उनकी कंपनी सागर मूवीटोन में चले गए, जहां उन्हें के.पी.घोष, महबूब खान और सर्वोत्तम बादामी जैसे उस दौर के बड़े निर्देशकों के साथ काम करने का मौक़ा मिला| 1933 से 1940 के बीच भूडो ने कुल 35 फ़िल्मों में अभिनय किया| इनमें सागर मूवीटोन के बैनर की 'डॉ.मधुरिका', ‘डेकन क्वीन', ‘दो दीवाने', ‘जागीरदार', ‘मनमोहन’, 'हम तुम और वो', ‘महागीत' और 'पोस्टमैन' जैसी 20 फ़िल्में भी शामिल थीं|
रमेश आडवाणी जी बताते हैं, “साल 1940 में सागर मूवीटोन का युसुफ़ फ़ज़लभॉय की कंपनी में विलय हुआ और नेशनल स्टूडियो अस्तित्व में आया, तो सागर मूवीटोन के ज़्यादातर स्टाफ़ को छुट्टी दे दी गयी| इनमें पिताजी भी शामिल थे, हालांकि बाहर आकर भी वो लगातार काम करते रहे| उन्होंने साल 1941 में 'प्रकाश पिक्चर्स' के बैनर की फ़िल्म 'दर्शन' में एक अहम भूमिका तो की ही, नौशाद के संगीत में ज्योति और प्रेम अदीब के साथ मिलकर एक गीत 'कोई कब तक रहे अकेला, मौसम आया अलबेला' भी गाया था|”
1940 के दशक में भी भूडो ने कुल 35 फ़िल्मों में काम किया, जिनमें महबूब खान की कंपनी 'महबूब प्रोडक्शंस’ के बैनर की 'अनमोल घड़ी' और 'अनोखी अदा’ के अलावा 'मेरी कहानी', ‘अमानत', 'बीसवीं सदी', ‘दुखियारी', 'इस्मत', ‘पूजा' और 'शौहर' जैसी फ़िल्में शामिल थीं| महबूब खान ने 'महबूब प्रोडक्शंस’ की नींव सागर मूवीटोन के विलय के बाद, साल 1943 में रखी थी|”
भूडो एक बेहतरीन कॉमेडियन थे और ज़्यादातर फ़िल्मों में वो कॉमेडी ही करते नज़र आए थे| 1950 के दशक में भूडो आडवाणी 'मीना बाज़ार', ‘आदमी', 'आख़िरी दांव', ‘बूट पॉलिश', ‘श्री 420’, ‘जागते रहो', ‘अब दिल्ली दूर नहीं', ‘मधुमती', ‘मधुर मिलन', ‘मिस कोकाकोला', ‘क़ैदी नंबर 911’ और 'आंखें' जैसी कुल 20 फ़िल्मों में नज़र आए| इनमें से ‘बूट पॉलिश' के कॉमेडी गीत 'लपक झपक तू आ रे बदरवा, सर की खेती सूख रही है" में उनके काम को बहुत सराहा गया|
'Lapak jhapak tu aa re badarwa' - Boot Polish / 1954
1960 के दशक में भूडो ने 'अनुराधा' और 'खामोशी' समेत केवल 5 फ़िल्में कीं| 44 साल के अपने करियर में उन्होंने 102 हिन्दी, 2 गुजराती और 4 सिंधी फ़िल्मों में काम किया| इनमें से दो सिंधी फ़िल्मों ‘इंसाफ़ कित्थे आ' और 'राए दियाच' में उनकी पत्नी ने भी अभिनय किया था| 'राए दियाच' में भूडो और उनकी पत्नी ने हीरो के मां-बाप की भूमिका की थी|
Bhudo ji with wife, son, d/l & grandchildren
भूडो आडवाणी जी की शादी साल 1939 में हुई थी| उनकी पत्नी सुशीला मीरचंदानी दिल्ली की रहने वाली थीं| उनके सात बच्चे हुए, पांच बेटियां और दो बेटे| साल 1940 में उनकी बड़ी बेटी का और 1943 में बड़े बेटे रमेश आडवाणी जी का जन्म हुआ| फिर तीन बेटियां, साल 1952 में छोटा बेटा और फिर सबसे छोटी बेटी| छोटे बेटे का साल 1968 में कॉलेज से लौटते समय लोकल ट्रेन से गिरकर 16 साल की उम्र में देहांत हो गया था| सबसे छोटी बेटी भी कम उम्र में ही गुज़र गयी थी| उधर कुछ साल पहले सबसे बड़ी बेटी भी नहीं रहीं|
भूडो की अन्य तीनों बेटियां शानू लालवाणी, सोनू इदनानी और पूनम अरोड़ा मुम्बई में ही रहती हैं| रमेश आडवाणी जी से 'बीते हुए दिन' की इस बातचीत के दो दिन बाद, 22 अक्टूबर 2023 को उनके 80वें जन्मदिन की पार्टी में, जुहू-वर्सोवा लिंक रोड के रेनेसां क्लब में उनकी तीनों बहनों से भी मेरा परिचय हुआ था|
रमेश आडवाणी जी ने देना बैंक में 40 साल की नौकरी के बाद 2001 में रिटायरमेंट ले लिया था| उनकी पत्नी सुन्दरी जगतियानी कोलकाता की रहने वाली थीं| वो साल 2008 में गुजरीं| रमेश जी के बेटे विनोद आडवाणी सिंगापुर की कंस्ट्रक्शन कंपनी मांगल्या ग्रुप में वाईस प्रेसिडेंट हैं और अपने परिवार के साथ बंगलौर में रहते हैं| पत्नी के निधन के बाद रमेश जी भी बेटे विनोद के पास बंगलौर शिफ्ट हो गए थे| रमेश जी की बेटी भाविका हिंगोरानी और उनके पति-बच्चे दुबई में रहते हैं|
भूडो आडवाणी जी दक्षिण मुम्बई के ताड़देव स्थित सेन्ट्रल स्टूडियो कम्पाऊंड में एक विशाल फ्लैट में रहते थे| साल 1977 में वो ताड़देव छोड़कर अंधेरी पश्चिम के सात बंगला इलाक़े की शांतिनिकेतन बिल्डिंग में रहने आ गए थे| उनकी आख़िरी फ़िल्म सत्यजित रे की साल 1977 की ही 'शतरंज के खिलाड़ी' थी| साल 1979 में उनकी पत्नी का निधन हुआ| और 25 जुलाई 1985 को, 80 साल की उम्र में भूडो आडवाणी भी दुनिया को अलविदा कह गए|
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Mr. Arun Kumar Deshmukh (Mumbai) & Mr. Biren Kothari (Vadodara / Writer of the Book 'Sagar Moviretone) for their valuable inputs about Mr. Bhudo Advani.
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Mr. Manaswi Sharma (Zurich-Switzerland) for the technical support.
“सांझ सवेरे, नैन तेरे मेरे, मिलते रहे हैं मिलते रहेंगे" - प्रेमेन्द्र
..…..शिशिर कृष्ण शर्मा
हिन्दी सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे कलाकार हुए, जो गिनी-चुनी फ़िल्में करने के बाद तमाम चमक-दमक से जगमगाती इस मायावी दुनिया को निजी कारणों से बेझिझक अलविदा कह गए| उनमें से कई ऐसे थे, जिन्होंने अपना करियर बतौर हीरो शुरू किया, अपनी उसी स्थिति को बनाए रखा, लेकिन फिर उन्हें अचानक ही एक आम इंसान की सी गुमनामी भरी ज़िंदगी कहीं ज़्यादा भा गयी| 'बीते हुए दिन' ऐसे ही भूलेबिसरे कलाकारों की तलाश में जुटा रहा, आज भी जुटा हुआ है और अगर पाठकों-प्रशंसकों का सहयोग मिलता रहा तो आने वाले समय में भी अपनी इस मुहिम को यथासंभव जारी रखेगा|
'प्रेमेन्द्र' एक ऐसा ही नाम हैं, जिन्होंने 1970 और 71 के दो सालों में 'होली आयी रे', 'दुनिया क्या जाने' और 'साज़ और सनम' समेत कुल 5 जानीमानी फ़िल्में बतौर हीरो करने के बाद फ़िल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया था| और फिर बदलती पीढ़ियों के साथ दर्शकों के ज़हन में बसी उनकी यादें धुंधलाती चली गयीं|
प्रेमेन्द्र का नाम मैंने पहली बार लगभग 5 साल पहले, रामसे की फ़िल्मों में शैतान का रोल करने वाले अभिनेता अनिरूद्ध अग्रवाल से, ‘बीते हुए दिन' के लिए हो रही बातचीत में सुना था| उन्होंने बताया था कि प्रेमेन्द्र उनके दोस्त थे, उनका पूरा नाम प्रेमेन्द्र पाराशर था और वो आगरा के पास स्थित फ़तेहपुर सीकरी के रहने वाले थे| और जब उन्होंने बताया कि प्रेमेन्द्र 'होली आयी रे', ‘दुनिया क्या जाने' और 'साज़ और सनम' जैसी जानीमानी फ़िल्मों के हीरो थे तो स्वाभाविक तौर पर मेरे मन में प्रेमेन्द्र के बारे में ब्लॉग 'बीते हुए दिन' में लिखने की इच्छा जागृत हो गयी थी| लेकिन प्रश्न ये, कि 'बीते हुए दिन' की विशेष पहचान और अघोषित नियम के अनुसार प्रेमेन्द्र के बारे में बात करूं तो किससे करूं? उनके परिवार या किसी पारिवारिक सदस्य का पता अथवा संपर्कसूत्र मुझे मिल ही नहीं पा रहा था|
साल दर साल गुज़रते गए| प्रेमेन्द्र के बारे में लिखने की मेरी इच्छाशक्ति धूमिल होने लगी| लेकिन अचानक ही एक रोज़ ‘बीते हुए दिन' के प्रशंसक और सहयोगी, ग्वालियर के रहने वाले श्री आनंद पाराशर जी के माध्यम से फ़ोन पर मेरा संपर्क प्रेमेन्द्र के छोटे भाई श्री रामेश्वरनाथ उर्फ़ चुनचुन पाराशर जी से हुआ जो फ़तेहपुर सीकरी में रहते हैं| उन्होंने प्रेमेन्द्र जी के बारे में जानकारी तो दी ही, साथ ही अपने भतीजे यानी प्रेमेन्द्र जी के बेटे मुनीश से भी मेरी बात कराई जो मुम्बई के अंधेरी (पश्चिम) में रहते हैं, लेकिन उन दिनों फतेहपुर सीकरी में थे| और फिर लगभग डेढ़ महीने बाद, 7 अगस्त 2023 की दोपहर मुनीश जी के घर पर उनसे उनके पिता के बारे में मेरी विस्तार से बातचीत भी संपन्न हो ही गयी|
प्रेमेन्द्र जी का जन्म 2 दिसंबर 1942 को उनके ननिहाल आगरा में हुआ था| उनके पिता मुरारीलाल पाराशर जी की गिनती फ़तेहपुर सीकरी के नामी लोगों में होती थी| वो 86 गांवों के ज़मींदार होने के साथ साथ लगातार 25 सालों तक नगरपालिका के चेयरमैन भी रहे थे| उनके 3 बेटों और 3 बेटियों में प्रेमेन्द्र सबसे बड़े थे| उनसे छोटी 2 बहनें स्नेहलता और मंजु, चौथे नंबर पर भाई चुनचुन जी, फिर बहन संध्या और फिर सबसे छोटे भाई राजेन्द्रनाथ जी|
प्रेमेन्द्र जी का असली नाम त्रिलोकीनाथ पाराशर था| उन्होंने फ़तेहपुर सीकरी से 11वीं पास करने के बाद आगरा कॉलेज में बी.एस.सी. में दाख़िला ले लिया था| बायोलॉजी उनका पसंदीदा विषय था और वो डॉक्टर बनना चाहते थे|
उन्हीं दिनों फ़िल्म 'लीडर' की शूटिंग के लिए दिलीप कुमार फ़तेहपुर आए तो 6 फ़ीट 2 इंच लम्बे खूबसूरत प्रेमेन्द्र को देखते ही उन्होंने कहा, ‘तुम बिल्कुल हीरो लगते हो, मुम्बई आ जाओ'| कुछ समय बाद अखबारों में, पूना में नये नये शुरू हुए फ़िल्म संस्थान का विज्ञापन छपा| प्रेमेन्द्र उन दिनों बी.एस.सी. फ़ाइनल में थे| अपने दोस्तों के ज़ोर देने पर उन्होंने फ़िल्म संस्थान का फार्म भर दिया| लिखित परीक्षा और इंटरव्यू दिल्ली में हुए| इंटरव्यू बोर्ड में जगतमुरारी, बीना राय और रोशन तनेजा थे| प्रेमेन्द्र को 1963 के बैच में दाखिला मिल गया|
उस बैच में उनके सहपाठी थे, शत्रुघ्न सिन्हा, अनिल धवन, असरानी, सुभाष घई और बलदेव खोसा| शत्रुघ्न सिन्हा से प्रेमेन्द्र की गहरी दोस्ती हो गयी थी| साल 1966 में पासआउट होने के बाद प्रेमेन्द्र जी पूना से मुम्बई आए| कुछ समय वो एक गेस्ट हाउस में रहे और फिर अंधेरी (पश्चिम) स्थित लल्लूभाई पार्क की ललिता बिल्डिंग के फ्लैट नंबर 5 में किराए पर रहने लगे| कुछ सालों बाद उन्होंने वोही फ्लैट ख़रीद लिया था, जिसमें आज मुनीश रहते हैं|
With Kumud Chhugani in 'Holi Aayi Re'
प्रेमेन्द्र जी ने जो पहली फ़िल्म साईन की, वो थी श्री प्रकाश पिक्चर्स के बैनर की 'होली आयी रे’| इस फ़िल्म के निर्माता शंकरभाई भट्ट और विजय भट्ट थे, जिन्होंने साईलेंट के ज़माने से लेकर 1970 के दशक के उत्तरार्ध तक लगभग 68 फ़िल्में बनाई थीं| इनमें ‘भरत मिलाप', रामराज्य', बैजूबावरा', ‘गूंज उठी शहनाई', 'हरियाली और रास्ता' और 'हिमालय की गोद में' जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्में भी शामिल हैं| प्रेमेन्द्र जी फ़िल्म 'होली आयी रे’ के नायक थे और इसमें उनकी नायिका थीं, कुमुद छुगानी| इस फ़िल्म में प्रेमेन्द्र की बड़ी बहन के रोल में माला सिन्हा थीं|
मुनीश बताते हैं, “पापा चाहते थे कि वो त्रिलोकीनाथ की जगह किसी नये और आकर्षक नाम के साथ फ़िल्मों में डेब्यू करें| उन्हें 'प्रेम' नाम पसंद आया जो न्यूमरोलॉजी के हिसाब से भी उनपर सही बैठता था| ये वो समय था जब धर्मेन्द्र स्टार बन चुके थे और जीतेंद्र स्टारडम की तरफ़ बढ़ रहे थे| ऐसे में पापा के दोस्तों ने उन्हें भी धर्मेन्द्र और जीतेंद्र की तर्ज पर ही कोई फ़िल्मी नाम रखने की सलाह दी| और तब पापा ने अपना फ़िल्मी नाम 'प्रेम' से बदलकर 'प्रेमेन्द्र' रख लिया था|”
'होली आयी रे' के बाद जो दूसरी फ़िल्म प्रेमेन्द्र जी ने साईन की, वो थी निर्माता-निर्देशक हुदा बिहारी की 'जोगी'| हुदा बिहारी गीतकार एस.एच.बिहारी के भाई थे| मुनीश बताते हैं कि 'जोगी' की शूटिंग 'होली आयी रे' से पहले शुरू हुई थी|
प्रेमेन्द्र जी की शादी साल 1968 में हुई| उनकी पत्नी मंदा लन्दन में रहने वाले एक गुजराती मूल के परिवार से थीं| उनका पूरा नाम मंदाकिनी पंड्या था| अपनी भारत यात्रा के दौरान वो फ़िल्म की शूटिंग देखने के लिए 'होली आयी रे' के सेट पर आयी थीं जहां उनकी मुलाक़ात प्रेमेन्द्र जी से हुई, दोनों में दोस्ती हुई और फिर उन्होंने शादी कर ली थी|
प्रेमेन्द्र का करियर केवल 6 साल और 5 फ़िल्मों तक ही सीमित रहा साल 1966 में वो फ़िल्म संस्थान से पासआउट होकर मुम्बई आए| फ़िल्म 'होली आई रे' और 'जोगी' के अलावा उन्होंने 3 और फ़िल्में, बतौर हीरो कीं| वो थीं ‘दीदार', 'दुनिया क्या जाने' और 'साज़ और सनम'| 'होली आई रे' और ‘दीदार' साल 1970 में रिलीज़ हुईं, और 'दुनिया क्या जाने' और 'साज़ और सनम' 1971 में| 'जोगी' लगभग 80 प्रतिशत पूरी होने के बाद पैसे की कमी की वजह से अटक गयी थी| इसे पूरा होने में लगभग 12 साल लगे और ये फ़िल्म साल 1982 में जाकर रिलीज़ हो पायी थी| हालांकि तब तक प्रेमेन्द्र जी को फ़िल्मों से अलग हुए एक दशक बीत चुका था|
'Deedar'
निर्माता-निर्देशक जुगलकिशोर की फ़िल्म 'दीदार' में प्रेमेन्द्र की नायिका अंजना मुमताज़ थीं और इस फ़िल्म के दूसरे हीरो थे, धीरज कुमार| मद्रास की कंपनी 'चित्रालय पिक्चर्स' की फ़िल्म ‘दुनिया क्या जाने' के निर्देशक श्रीधर थे और संगीत शंकर जयकिशन का था| इसमें प्रेमेन्द्र की नायिका साउथ की मशहूर अभिनेत्री भारती थीं| 1930 के दशक से चली आ रही जानीमानी फ़िल्म कंपनी 'वाडिया मूवीटोन' के बैनर में बनी ‘साज़ और सनम' में प्रेमेन्द्र की नायिका रेखा थीं| जे.बी.एच.वाडिया द्वारा निर्मित और निर्देशित ‘साज़ और सनम' ‘वाडिया' के बैनर में बनी आख़िरी हिन्दी फ़िल्म थी|
इन 5 फ़िल्मों के अलावा करियर की शुरूआत में ही प्रेमेन्द्र जी ने 'आप से प्यार हुआ', ‘और पत्थर रो दिया', ‘दिल एक फूल है', ‘गंगा के उस पार', ‘मानो न मानो', ‘मुशायरा', ‘नादान बालमा' जैसी और भी लगभग 10 - 12 फ़िल्में साइन की थीं| लेकिन ये सभी फ़िल्में किसी न किसी वजह से बंद होती चली गयीं| एक संपन्न ज़मींदार ख़ानदान में जन्मे और राजसी माहौल में पलेबढ़े प्रेमेन्द्र जी के लिए तमाम असुरक्षाओं से भरी इन परिस्थितियों के साथ समझौता कर पाना संभव नहीं था| मुनीश के शब्दों में कहें तो - "पापा का रॉयल खून आड़े आ जाता था| और फिर वो हीरो के अलावा और कोई रोल करने को भी तैयार नहीं थे| इसलिए उन्होंने फ़ैसला कर लिया कि अब मैं फ़िल्में नहीं करूंगा|’’
फ़िल्मों से अलग होने के बाद प्रेमेन्द्र जी ने इंटीरियर डेकोरेशन और लैंपशेड्स और शैंडलेयर्स का बिज़नेस शुरू किया और जल्द ही उनका बिज़नेस ऊंचाईयों पर पहुंच गया| उनके ग्राहकों में मुम्बई के ताज, ओबेरॉय, हयात, लीला, सन एन सैंड, हॉलिडे इन और सेंटॉर जैसे तमाम टॉप के होटल शामिल थे| उसी दौरान प्रेमेन्द्र दो बेटों और दो बेटियों के पिता भी बन गए थे - सबसे बड़ी बेटी अंजली, उनके बाद बेटा ऋषि, तीसरे नंबर पर बेटा मुनीश और सबसे छोटी बेटी शिखा|
साल 1992 तक प्रेमेन्द्र जी का बिज़नेस बहुत अच्छा चला| लेकिन साल 1993 में मुम्बई में बम धमाके हुए तो यहां का होटल व्यवसाय लगभग ठप्प ही हो गया| नतीजतन प्रेमेन्द्र जी के बिज़नेस का ग्राफ़ भी एकदम से नीचे आ गया| हालांकि तब तक बच्चे बड़े हो चुके थे, दोनों बेटे काम करने लगे थे, सो घर उन्होंने संभाल लिया| ऐसे में प्रेमेन्द्र जी अपने वृद्ध पिता की सेवा और पारिवारिक संपत्ति की देखभाल के लिए फ़तेहपुर चले गए| उन्हीं दिनों उनकी पत्नी मंदा जी को भी अपनी बीमार मां की देखभाल के लिए लन्दन जाना पड़ा| मंदा जी अब लन्दन में रहती हैं|
प्रेमेन्द्र जी के बड़े बेटे ऋषि भी अभिनेता थे| उन्होंने ईटीवी (उर्दू) के धारावाहिक 'हमारी ज़ीनत', दूरदर्शन के 'सिराजुद्दौला' और ज़ीटीवी के 'गैम्बलर' के अलावा दो गुजराती फ़िल्मों और कुछ टीवी विज्ञापनों में भी काम किया था| अनिल शर्मा की फ़िल्म 'क़त्लेआम' में उनका अहम रोल था, लेकिन ये फ़िल्म अधूरी रह गयी| ऋषि फ़िल्मों में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे| लेकिन बात नहीं बनी तो साल 2004 में वो भी मां के पास लन्दन चले गए| और फिर शादी करके वहीं बस गए|
प्रेमेन्द्र जी की बड़ी बेटी अंजली भी अपने पति चिंटू सार्थक कल्ला के साथ लन्दन में रहती हैं| वो एक गायिका हैं और चिंटू जानेमाने संगीतकार, गायक और गिटारवादक| पति-पत्नी अपने म्यूज़िकल स्टेज शोज़ के लिए जाने जाते हैं|
मुनीश 'डी.एच.एल', 'शॉपर्स स्टॉप' और 'फारेस्ट एसेंशिअल्स' जैसी बड़ी कंपनियों से जुड़े रहे| वो मुम्बई में अपनी पत्नी और बेटे के साथ रहते हैं|
प्रेमेन्द्र जी की सबसे छोटी बेटी शिखा एक वास्तुशास्त्री हैं और पति के निधन के बाद अब दिल्ली में रहती हैं|
साल 1991 में प्रेमेन्द्र जी को आंतों की बीमारी हुई, जिसने असाध्य रूप ले लिया| साल 2019 में उनकी गर्दन में एक गांठ हुई, जांच में कैंसर का पता चला, 23 अक्टूबर 2019 को प्रेमेन्द्र जी को मुम्बई लाया गया जहां टाटा अस्पताल में उनका इलाज शुरू हुआ लेकिन बीमारी बढ़ती चली गयी|
लगभग 11 महिनों के इलाज के बाद सितम्बर 2020 के पहले हफ़्ते में जब कैंसर अपने चौथे और अंतिम चरण में पहुंच गया तो टाटा अस्पताल के डॉक्टरों की सलाह पर गंभीर रूप से बीमार प्रेमेन्द्र जी को एम्बुलेंस से वापस उनके पैतृक शहर फ़तेहपुर ले जाया गया| और फिर, लगभग 20 दिन बाद फ़तेहपुर में, दिनांक 7 अक्टूबर 2020 को 78 साल की उम्र में प्रेमेन्द्र जी का निधन हो गया|
अफ़सोस, कि कोरोनाकाल की पाबंदियों की वजह से प्रेमेन्द्र की पत्नी मंदा, बेटी अंजली और बेटा ऋषि उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए भारत नहीं आ पाए थे|
We are thankful to –
Mr. Harish Raghuvanshi (Surat) & Mr. Harmandir Singh ‘Hamraz’ (Kanpur) for their valuable suggestion, guidance, and support.
Mr. Anand Parashar (Gwalior) for connecting me with Parashar family.
Dr. Ravinder Kumar (NOIDA) for the English translation of the write up.
Mr. S.M.M.Ausaja (Mumbai) for providing movies’ posters.
Mr. Manaswi Sharma (Zurich-Switzerland) for the technical support.