Friday, October 31, 2014

“Leke Pehla Pehla Pyar” – Shyam Kapoor

लेके पहला पहला प्यार श्याम कपूर

                ...........शिशिर कृष्ण शर्मा

हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में दिलचस्पी रखने वाले पाठक अक्सर पूछते थे कि फ़िल्मसी.आई.डीके मशहूर गीतलेके पहला पहला प्यारमें देवआनंद और शकीला के साथ नज़र रहे बाक़ी दो कलाकार कौन हैं? ज़ाहिर है इस सवाल ने मेरे मन में भी उत्सुकता पैदा की। थोड़ी बहुत कोशिश के बाद ये तो पता चल गया कि इस गीत पर डांस कर रही लड़की शीला वाज़ हैं लेकिन हारमोनियम पर गीत गा रहे अभिनेता के बारे में पता कर पाना आसान नहीं था। दरअसल शीला वाज़ तो अपने दौर की एक जानी-पहचानी डांसर थीं लेकिन हारमोनियमवादक कलाकार का चेहरा बिल्कुल ही अजनबी था। लेकिन एक रोज़ ये रहस्य भी खुल ही गया। वो हारमोनियनवादक थे श्याम कपूर जो गुरूदत्त के असिस्टेण्ट थे।

मैंने श्याम कपूर को तलाशने की कोशिश की लेकिन उनका कुछ भी पता नहीं चल पाया। हालांकि तलाश भी आधे-अधूरे मन से की थी क्योंकि लगता था पता नहीं श्याम कपूर अब होंगे भी या नहीं। अचानक एक रोज़ फ़ेसबुक पर एक पाठक का संदेश मिला। उन्होंने लिखा था कि श्याम कपूर जीवित हैं और साथ में उन्होंने श्याम कपूर का आधा-अधूरा सा पता भी दिया था। लेकिन श्याम कपूर का फ़ोन नम्बर उनके पास भी नहीं था। ऐसे में मुझे एम.टी.एन.एल. की टेलिफ़ोन डायरेक्टरी की सी.डी. की मदद लेनी पड़ी। सी.डी. में मुझे श्याम कपूर का फ़ोन नम्बर मिल गया। गायिका शमशाद बेगम तक भी मैं इसी सी.डी. के ज़रिए पहुंचा था।

श्याम कपूर का फ़ोन लगातारआऊट ऑफ़ सर्विसआता रहा। मजबूरन मुझे ख़ुद उनके घर जाने का फ़ैसला करना पड़ा। अधूरा पता हाथ में लिए पूछता-पूछता एक रोज़ किसी तरह उनके दरवाज़े पर पहुंचा तो वहां ताला लगा मिला। पता चला वो कुछ दिनों के लिए बाहर गए हुए हैं। उनके ठीक बगल वाले फ़्लैट में रहने वाली महिला से श्याम कपूर का एक अन्य फ़ोन नम्बर लेकर मैं वापस लौट आया। और फिर एक रोज़ उनसे बात करने में मुझे कामयाबी मिल ही गयी।

24 सितम्बर 2014 की शाम क़रीब 4 घण्टे मैंने श्याम कपूर के घर पर उनके साथ गुज़ारे। उस दौरान उन्होंने अपनी निजी और व्यावसायिक ज़िंदगी के साथ साथ गुरूदत्त और वहीदा रहमान के बारे में भी बहुत सी बातें बताईं।   

24 अप्रैल 1928 को लाहौर की चूनियां तहसील में जन्मे श्याम कपूर बहुत छोटे थे जब उनकी मां गुज़र गयी थीं। पिता क्वेटा में पोस्ट मास्टर थे। श्याम कपूर और उनसे क़रीब ढाई साल बड़े उनके भाई बनारसीदास ने दादा-दादी के पास चूनियां में रहकर 8वीं तक की पढ़ाई की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए लाहौर जाकर हॉस्टल में रहने लगे। देश का बंटवारा हुआ तो उस वक़्त बनारसीदास बी.. (फ़ाईनल) और श्याम कपूर 12वीं में पढ़ रहे थे। पढ़ाई बीच ही में छोड़कर वो दादा-दादी के साथ लुधियाना चले आए। उधर क्वेटा से उनके पिता का ट्रांसफर देहरादून हो गया।

उन्हीं दिनों अख़बारों में विज्ञापन छपा, अगर कोई छात्र कुरूक्षेत्र में बनाए गए शरणार्थी कैम्प में तीन महिने सोशल सर्विस करेगा तो उसे बिना इम्तहान के ही पास मान लिया जाएगा। विज्ञापन देखकर श्याम कपूर और उनके बड़े भाई बनारसीदास कपूर कुरूक्षेत्र चले गए। तीन महिने की सोशल सर्विस के बदले बनारसीदास को बी.. की डिग्री और श्याम कपूर को 12वीं पास का सर्टिफ़िकेट मिल गया। साथ ही सरकार की तरफ़ से उन्हें नौकरी का प्रस्ताव भी दिया गया जिसे दोनों भाईयों ने स्वीकार कर लिया। कुछ महीने कुरूक्षेत्र और अलवर में बिताने के बाद श्याम कपूर नौकरी छोड़कर अपने मामा के पास अम्बाला चले गए| बनारसीदास भी तब तक नौकरी छोड़कर पिता के पास देहरादून चले गए थे। उधर दादा-दादी लुधियाना छोड़कर फ़िरोज़पुर में जा बसे थे।

मामा महज़ ढाई-तीन साल बड़े थे। उनका चीनी का कारोबार था। उनके साथ पार्टनरशिप में काम शुरू किया और मोगा मंडी वाला ऑफ़िस सम्भालने लगे। फिर किसी बात पर अनबन हुई तो श्याम कपूर ने मामा से अलग होने का फ़ैसला कर लिया।

पड़ोस के ही एक हलवाई से श्याम कपूर की अच्छी पहचान हो गयी थी। उसका लड़का मुम्बई में नेवी का अफ़सर था जो कुछ दिनों की छुट्टी पर घर आया हुआ था। उसे अपने साथ एक सहायक का भी पास मिलता था। छुट्टियां ख़त्म हुईं तो उसने श्याम कपूर को अपने साथ मुम्बई चलने का न्यौता दिया। श्याम कपूर ने मामा से पैसे लिए और उस नेवी के अफ़सर के सहायक बनकर वो उसके साथ मुम्बई चले आए। मुम्बई में श्याम कपूर के ठहरने का इंतज़ाम भी उसी अफ़सर ने कराया। उस वक़्त श्याम कपूर की उम्र क़रीब 21 साल थी।

श्याम कपूर सिर्फ़ घूमने-फिरने के मक़सद से मुम्बई आए थे। उन्होंने एहतियातन सौ रूपए उस अफ़सर के पास वापसी के किराए के लिए रख दिए थे। सोचा था, जब जेब के पैसे ख़त्म होने लगेंगे तो उससे सौ रूपए लेकर वापस पंजाब लौट जाऊंगा। उन दिनों कोलाबा से किंग्स सर्किल तक ट्राम चलती थी। श्याम कपूर रोज़ाना ट्राम में बैठते थे, किंग्स सर्किल जाते थे और उसी ट्राम से वापस जाते थे। एक रोज़ किंग्स सर्किल में किसी फ़िल्म की शूटिंग चल रही थी। सीन के मुताबिक़ ट्रक में बैठे कुछ लड़कों को कार में बैठी लड़कियों का पीछा करते हुए उन पर फ़ब्तियां कसनी थीं। उनमें से एक लड़के का डायलॉग था, ‘ईस्ट मीट्स वेस्ट’, जिसे वो ठीक से बोल नहीं पा रहा था।

श्याम कपूर के मुताबिक़ डायरेक्टर अपने असिस्टेंट को और असिस्टेंट उस जूनियर आर्टिस्ट सप्लायर को गालियां दे रहा था जो उस लड़के को लेकर आया था। ऐसे में श्याम कपूर ने सप्लायर से पूछा, मैं बोलूं? सप्लायर ने तो उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया लेकिन असिस्टेंट ने श्याम कपूर को बुलाकर पूछा, बोल लोगे? उनके हां कहने पर उस लड़के की जगह श्याम कपूर को कैमरे के सामने खड़ा कर दिया गया। और शॉट पहले ही टेक में ओके हो गया। श्याम कपूर के मुताबिक़ उन दिनों आम जूनियर आर्टिस्ट का रेट 6 रूपए 6 आने रोज़ होता था जबकि अंग्रेज़ी डायलॉग बोलने वाले को 25 रूपए मिलते थे। सप्लायर ने उन्हें पैसे लेने के लिए अगले दिन दादर नाका पर बुलाया जहां उनकी मुलाक़ात कई और जूनियर आर्टिस्टों से हुई।

जेब के सारे पैसे ख़त्म हो चुके थे। उधर जहां ठहरने का इंतज़ाम था, वहां से भी उन्हें ख़ाली करने को कह दिया गया था। श्याम कपूर पंजाब वापस लौटने का फ़ैसला करके अपने सौ रूपए लेने पहुंचे तो पता चला उनके जानने वाले उस नेवी अफ़सर को जहाज़ पर विशाखापट्टनम भेज दिया गया है। अब श्याम कपूर के पास तो वापस लौटने का किराया था और ही रहने की जगह। ऐसे में जूनियर आर्टिस्टों ने उनकी बहुत मदद की। श्याम कपूर को उन्होंने अपने ग्रुप में शामिल कर लिया और श्याम कपूर को भी इस शहर में पैसा कमाने का एक ज़रिया मिल गया। अगले कुछ सालों तक वो फ़िल्मों में लगातार जूनियर आर्टिस्ट का काम करते रहे। और काम के दौरान ही एक रोज़ उनकी मुलाक़ात गुरूदत्त से हुई।


गुरूदत्त की फ़िल्मआरपारके क्लब सांगबाबूजी धीरे चलना, प्यार में ज़रा सम्भलनाकी शूटिंग चल रही थी। इसके एक शॉट में श्याम कपूर को अपनी टेबल से उठकर शकीला के क़रीब आना था और गुरूदत्त पर नज़र पड़ते ही ग़ुस्से से वापस अपनी टेबल की तरफ़ चले जाना था। गुरूदत्त को श्याम कपूर का काम बेहद पसंद आया। उन्होंने श्याम कपूर को मेकअप रूम में बुलाकर पूछा, डायलॉग बोल सकते हो? श्याम कपूर केहांकहने पर उन्होंने श्याम कपूर से मिलते रहने को कहा।

गुरूदत्त का ऑफ़िस उन दिनों महालक्ष्मी के फ़ेमस स्टूडियो में था। अब जैसे ही समय मिलता, श्याम कपूर गुरूदत्त के ऑफ़िस पहुंच जाते। श्याम कपूर के मुताबिक़ गुरूदत्त को अक्सर अपनी ही शूट की हुई चीज़ें पसन्द नहीं आती थीं और वो उन्हें दोबारा शूट करते थे।बाबूजी धीरे चलना, प्यार में ज़रा सम्भलनागीत को भी रीशूट किया गया था। उन दिनों इस गीत की एडिटिंग चल रही थी। पहले वाले वर्शन में श्याम कपूर नहीं थे। गुरूदत्त ने श्याम कपूर को दोनों वर्शन दिखाकर पूछा कौन सा बेहतर है? श्याम कपूर ने रीशूट किए गए वर्शन को बेहतर बताते हुए साथ में ये भी कह दिया कि आप ये मत सोचना कि पहले वाले वर्शन में मैं नहीं हूं इसलिए उसे रिजेक्ट कर रहा हूं। बुरा वो भी नहीं है, लेकिन रीशूट किया हुआ वर्शन बेहतर है। गुरूदत्त श्याम कपूर के इस जवाब से बेहद ख़ुश हुए।

गुरूदत्त के चीफ़ असिस्टेंट राज खोसला को उन्हीं दिनों बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म (मिलाप / 1954) मिली। राज खोसला की खाली जगह पर निरंजन शर्मा को असिस्टेंट से पदोन्नत करके चीफ़ असिस्टेंट बना दिया गया। उधर श्याम कपूर की इच्छा को देखते हुए गुरूदत्त ने उन्हें असिस्टेंट की ख़ाली जगह पर रख लिया। बकौल श्याम कपूर, उन्होंने फ़िल्ममिस्टर एंड मिसेज़ 55के गीतउधर तुम हसीं हो इधर दिल जवां हैकीमहबूब स्टूडियोमें चल रही शूटिंग में हिस्सा लेकर 17 सितम्बर 1954 को बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर करियर शुरू किया था। उस दिन से गुरूदत्त के आख़िरी समय तक वो उनके साथ काम करते रहे।

.पी.नैयर को याद करते हुए श्याम कपूर कहते हैं, “वो बेहद गुणी संगीतकार थे। लेकिन कब किसको क्या कह दें, ये कोई नहीं बता सकता था। फ़िल्मसी.आई.डी.’ के लिए साऊथ से नयी नयी आयीं सीधी-सादी वहीदा रहमान को देखकर .पी.नैयर ने गुरूदत्त से कहा था, ‘नयी आया रखी है क्या’? इस पर गुरूदत्त ने सिर्फ़ इतना ही कह पाए थे, ‘वक़्त बताएगा, इंतज़ार करो

श्याम कपूर बताते हैं, गुरूदत्त फ़िल्म्स कीसी.आई.डी.’ औरप्यासाएक साथ शुरू हुई थीं। गुरूदत्तप्यासाके हीरो भी थे और निर्देशक भी। गुरूदत्त का असिस्टेंट होने के नाते श्याम कपूर फ़िल्मप्यासाकी यूनिट में थे। उधरसी.आई.डी.’ का निर्देशन राज खोसला कर रहे थे। उन के असिस्टेंट प्रमोद चक्रवर्ती और भप्पी सोनी से श्याम कपूर की दोस्ती थी इसलिए अक्सर श्याम कपूरसी.आई.डी.’ के सेट पर भी आतेजाते रहते थे।

एक रोज़ गुरूदत्त ने श्याम कपूर से कहा, ‘सी.आई.डी.’ के गाने में तुम काम करोगे। श्याम कपूर मानसिक तौर पर अभिनय के लिए तैयार ही नहीं थे। लेकिन गुरूदत्त के दबाव के आगे झुककर उन्हें फ़िल्मसी.आई.डी.’ के उस गीतलेके पहला पहला प्यार भरके आंखों में ख़ुमारमें काम करना ही पड़ा। ये गीत वर्ली सी-फ़ेस पर तीन दिन में शूट हुआ था।

फ़िल्मसी.आई.डी.’ के ही गीतादत्त के गाए गीतजाता कहां है दीवाने सब कुछ यहां है सनमके बारे में श्याम कपूर कहते हैं, ये धारणा बिल्कुल ग़लत है कि गीत की एक पंक्ति मेंफ़िफ़्टीशब्द के इस्तेमाल पर सेंसर की आपत्ति की वजह से इस गीत को फ़िल्म से निकाला गया था। इसे फ़िल्म से निकाले जाने की वजह थी फ़िल्म की लम्बाई। दरअसल उस ज़माने में फ़िल्म के 13 हज़ार फ़ीट से ज़्यादा लम्बा होने पर फ़िल्म पर टैक्स बहुत ज़्यादा बढ़ जाते थे और फ़िल्मसी.आई.डी.’ भी तय सीमा से ज़्यादा लम्बी हो गयी थी

प्यासा12-13 रील बन चुकी थी।प्यासाऔरसी.आई.डी.’ का ट्रायल हुआ। गुरूदत्त कोप्यासापसन्द नहीं आयी। उन्होंने कम्पनी के डायरेक्टर और प्रोडक्शन कण्ट्रोलर एस.गुरूमूर्ति सेप्यासाको रोककर पहलेसी.आई.डी.’ को पूरा करने को कहा।सी.आई.डी.’ रिलीज़ हुई और ज़बर्दस्त हिट हुई। उसके बाद गुरूदत्त ने एक बार फिर सेप्यासाकी स्क्रिप्ट पर काम शुरू किया। स्क्रिप्ट में जॉनीवॉक़र का रोल जोड़ा गया। इसके अलावा हीरो को धोखा देने वाले उसके दोस्त का भी रोल जोड़ा गया। दोस्त का ये निगेटिव रोल श्याम कपूर को दिया गया। सिर्फ़ 2-3 गानों को छोड़कर पूरी फ़िल्म दोबारा शूट की गयी।

उधर राज खोसला और .पी.नैयर कोप्यासाका रीशूट किया जाना पसंद नहीं आया। एक पार्टी में उन्होंने खुल्लमखुल्ला कह भी दिया कि गुरूदत्त को (सी.आई.डी.’ से) पैसा कमाकर हमने दिया और वो उसेप्यासापर बरबाद कर रहा है। गुरूदत्त तक ये बात पहुंची तो उन्हें बहुत बुरा लगा, हालांकि आगे चलकरप्यासाभी ज़बर्दस्त हिट हुई। श्याम कपूर के मुताबिक़ .पी.नैयर फ़िल्मप्यासामें एस.डी.बर्मन को लिए जाने से भी बेहद नाराज़ थे। उन्होंने बाहर कई लोगों से कहा भी था, गुरूदत्त एक बार मुझसे बात तो करते, क्या मैं सिर्फ़ मारधाड़ की ही फ़िल्मों के लायक हूं?

फ़िल्मकाग़ज़ के फूलमें निरंजन शर्मा और श्याम कपूर के अलावा गुरूदत्त ने गोबिन्द नाम के एक और असिस्टेंट को साथ में रखा था। ये फ़िल्म सामान्य से चार गुना ज़्यादा शूट हुई थी। फ़िल्म नहीं चली और इसमेंसी.आई.डी.’ औरप्यासासे कमाया हुआ पैसा भी डूब गया।सी.आई.डी.’ 1956 में, ‘प्यासा1957 में औरकागज़ के फूल1959 में रिलीज़ हुई थीं। श्याम कपूर के मुताबिक़ फ़िल्मकाग़ज़ के फूलकी नाकामी ने गुरूदत्त के आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया था। आर्थिक संकट से उबरने के लिए उन्हेंसौतेला भाई’, ‘भरोसा’, ‘बहूरानी’, ‘सुहागन’, ‘सांझ और सवेराजैसी बाहर की कुछ फ़िल्में बतौर हीरो करनी पड़ीं थीं। लेकिनकागज़ के फूलके बाद उन्होंने आधिकारिक तौर पर किसी भी फ़िल्म का निर्देशन नहीं किया।

साल 1960 में गुरूदत्त ने मुस्लिम पृष्ठभूमि पर फ़िल्मचौदहवीं का चांदका निर्माण किया जिसके निर्देशन की ज़िम्मेदारी उन्होंने एम.सादिक़ को दी। गुरूदत्त चाहते थे कि इस फ़िल्म के गीत साहिर लुधियानवी लिखें। इसका सीधा मतलब यही था किचौदहवीं का चांदमें एस.डी.बर्मन और .पी.नैयर नहीं होंगे क्योंकि साहिर के साथ उन दोनों की टीम टूट चुकी थी। गुरूदत्त के ज़हन में साल 1958 की, मुस्लिम पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्ममेहंदीका संगीत ताज़ा था जिसके संगीतकार रवि थे। गुरूदत्त ने फ़िल्मचौदहवीं का चांदके लिए रवि को साईन कर लिया। साहिर के साथ काम करने में रवि को कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन उन्होंने गुरूदत्त से अपने साथी गीतकार शकील बदायुंनी की सिफ़ारिश ज़रूर की। गुरूदत्त को शकील बदायुंनी का लिखा पसन्द आया और इस तरह फ़िल्मचौदहवीं का चांदमें साहिर की जगह शकील गए।

श्याम कपूर बताते हैं, “गुरूदत्त फ़िल्म्स की अगली फ़िल्मसाहब बीबी और ग़ुलामके निर्देशन की ज़िम्मेदारी लेखक अबरार अल्वी को दी गयी।काग़ज़ के फूलके फ़्लॉप होने के बाद से गुरूदत्त निर्देशन में अपना नाम देना ही नहीं चाहते थे। लेकिन अबरार अल्वी का नाम सुनकर मीना कुमारी ने फ़िल्म करने से इंकार कर दिया। वो इस शर्त पर तैयार हुईं कि गुरूदत्त सेट पर ज़रूर मौजूद रहेंगे। फ़िल्मसाहब बीबी और ग़ुलाममें भले ही बतौर निर्देशकअबरार अल्वीका नाम दिया गया लेकिन इसका 90 प्रतिशत हिस्सा गुरूदत्त ने निर्देशित किया था। ये फ़िल्म 1962 में रिलीज़ हुई थी

फ़िल्मबहारें फिर भी आएंगी14 रील बन चुकी थी। लेकिन 10 अक्टूबर 1964 को अचानक ही गुरूदत्त गुज़र गए। उनकी मौत के बारे में आज भी तमाम तरह की अफ़वाहें सुनने को मिलती हैं। लोग कहते हैं कि गुरूदत्त ने आत्महत्या की थी। लेकिन मैं इस बात को नहीं मानता। दरअसल जिस रात वो गुज़रे थे, उस रोज़ हमनेगुरूदत्त स्टूडियोमेंबहारें फिर भी आएंगीके क्लाईमेक्स का, माला सिन्हा की मौत का सीन शूट किया था। गुरूदत्त फ़िल्म के हीरो थे और निर्देशक थे, शाहिद लतीफ़।गुरूदत्त स्टूडियोअंधेरी (पूर्व) मेंनटराज स्टूडियोके पीछे था। आज उस जगह पर मुम्बई-अहमदाबाद हाईवे बन गया है।

शाम को पैकअप के बाद माला सिन्हा ने गुरूदत्त से अगले दिन की छुट्टी मांगी क्योंकि उन्हें किसी फ़िल्म के प्रीमियर के लिए कोलकाता जाना था। माला सिन्हा अपने मेकअप रूम में चली गयीं और गुरूदत्त पहली मंज़िल पर बने अपने ऑफ़िस की सीढ़ियां चढ़ने लगे। तनुजा उनके साथ थीं। अचानक गुरूदत्त रूककर अपना सीना सहलाने लगे। तनुजा के पूछने पर उन्होंने कहा, “तबीयत कुछ गड़बड़ है, हार्ट की प्रॉब्लम लग रही है फिर फीकी हंसी हंसते हुए कहने लगे, “माला को देखो, कल छुट्टी ले रही है...आर्टिस्ट प्रोड्यूसर को हार्ट प्रॉब्लम ही तो देते हैं दरअसल गुरूदत्त की तबीयत दिन से ही ख़राब थी। मेरा मानना है कि रात को अगर उन्होंने वाकई शराब पी होगी या नींद की गोलियां खाई होंगी तो उनका बीमार शरीर उस नशे को बर्दाश्त नहीं कर पाया होगा। लेकिन इसे आत्महत्या कहना ग़लत है

गुरूदत्त और वहीदा रहमान के रिश्तों के बारे में श्याम कपूर बताते हैं, “वहीदा चाहती थीं कि गुरूदत्त इस्लाम धर्म अपनाकर उनसे शादी कर लें, हालांकि एम.सादिक़ और जॉनी वॉकर धर्मपरिवर्तन की वहीदा की शर्त से सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि किसी पर धर्मपरिवर्तन के लिए दबाव डालना गलत बात है। उधर गुरूदत्त का कहना था कि गीता दत्त किसी भी हालत में तलाक़