Sunday, September 8, 2013

“Dil Ne Phir Yaad Kiya Barq Si Laher Aayi Hai” – Suman Kalyanpur

दिल ने फिर याद किया बर्क़ सी लहर आयी हैसुमन कल्याणपुर         

                           ......शिशिर कृष्ण शर्मा          

सुमन कल्याणपुर !!!...ये नाम है बेहद सुरीली उन पार्श्वगायिका का जिन्होंने लता मंगेशकर के एकाधिकार के दौर में सिर्फ़ अपनी एक सम्मानजनक पहचान बनाई बल्कि उस दौर के लगभग सभी दिग्गज संगीतकारों के निर्देशन में गीत भी गाए। इसके बावजूद उन्हें वो जगह कभी नहीं मिल पायी जिसकी वो हक़दार थीं। शास्त्रीय गायन की ख़ासी समझ, कर्णप्रिय आवाज़ और विस्तृत रेंज जैसी पार्श्वगायन के लिए ज़रूरी सभी ख़ासियतों के होते हुए भी हिन्दी फ़िल्मोद्योग ने सुमन कल्याणपुर को कभी लता मंगेशकर की छाया से बाहर नहीं आने दिया। क़रीब तीन दशकों के अपने करियर में उन्होंने हिन्दी, मराठी, गुजराती, पंजाबी और भोजपुरी सहित एक दर्जन से भी ज़्यादा भारतीय भाषाओं-बोलियों के तीन हज़ार से ज़्यादा फ़िल्मी-ग़ैर फ़िल्मी गीत-ग़ज़ल गाए और फिर बदलते वक़्त के साथ सिनेमा को अलविदा कह दिया।

सुमन कल्याणपुर से मेरी मुलाक़ात उनके खार (पश्चिम) स्थित घर पर कुछ साल पहले हुई थी। उस दौरान उन्होंने अपने निजी और व्यावसायिक जीवन के बारे में विस्तार से बातचीत की थी। सुमन कल्याणपुर के पिता शंकर राव हेमाडी मूल रूप से मंगलौर - कर्नाटक के चित्रापुर के एक संभ्रांत सारस्वत ब्राह्मण परिवार से थे। वो सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया में ऊंचे पद पर थे और नौकरी के सिलसिले में उनका काफ़ी लंबा समय ढाका (अब बांग्लादेश) में गुज़रा था। सुमन कल्याणपुर का जन्म 28 जनवरी 1937 को कोलकाता में हुआ था। परिवार में पिता और मां सीता हेमाडी के अलावा सुमन समेत पांच बहनें और एक भाई थे जिनमें सुमन सबसे बड़ी थीं। साल 1942 में सुमन के पिता परिवार को साथ लेकर मुंबई चले आए थे।  

पेंटिंग और संगीत में सुमन की हमेशा से दिलचस्पी थी। मुंबई के मशहूर सेंट कोलंबिया हाई स्कूल से स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए सर जे.जे.स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में दाखिला ले लिया।  साथ ही वो अपने पारिवारिक मित्र और पुणे की प्रभात फ़िल्म्स के संगीतकार पंडितकेशवराव भोलेसे गायन भी सीखने लगीं। सुमन के मुताबिक़, उन्होंने गायन को महज़ शौक़िया तौर पर सीखना शुरू किया था लेकिन धीरे धीरे इस तरफ़ उनकी गंभीरता बढ़ने लगी तो वो विधिवत रूप सेउस्ताद ख़ान अब्दुल रहमान ख़ानऔरगुरूजी मास्टर नवरंगसे संगीत की शिक्षा लेने लगीं।

सुमन के मुताबिक़, “हमारे घर में सभी का झुकाव कला और संगीत की तरफ़ था, लेकिन सार्वजनिक तौर पर गाने-बजाने पर पाबंदी थी। इसके बावजूद साल 1952 में मुझेऑल इंडिया रेडियोपर गाने का मौक़ा मिला तो मैं इंकार नहीं कर पायी। ये मेरा पहला सार्वजनिक कार्यक्रम था जिसके ठीक एक साल बाद साल 1953 में मुझे मराठी फ़िल्मशुक्राची चांदनीमें गाने का मौक़ा मिला। शेख मुख़्तार उन दिनों फ़िल्ममंगूबना रहे थे जिसके संगीतकार थे मोहम्मद शफ़ी। फ़िल्मशुक्राची चांदनीके मेरे गीतों से प्रभावित होकर शेख मुख़्तार ने मुझसे फ़िल्ममंगूके लिए तीन गीत रेकॉर्ड कराए। लेकिन फिर पता नहीं किन वजहों से फ़िल्ममंगूमें मोहम्मद शफ़ी की जगह .पी.नैयर गए और उस फ़िल्म में मेरी गायी सिर्फ़ एक लोरीकोई पुकारे धीरे से तुझेही बाक़ी रही। इस तरह साल 1954 में बनी फ़िल्ममंगूसे हिन्दी फ़िल्मों में मेरे गायन की शुरूआत हुई थी

फ़िल्ममंगूके फ़ौरन बाद सुमन को इस्मत चुगताई द्वारा निर्मित और शाहिद लतीफ़ द्वारा निर्देशित फ़िल्मदरवाज़ा(1954) में नाशाद के संगीत-निर्देशन में 5 गीत गाने का मौक़ा मिला था। लेकिन ये फ़िल्म पहले प्रदर्शित हुई थी इसलिए आमतौर पर इसे सुमन कल्याणपुर की पहली फ़िल्म माना जाता है। साल 1954 में ही सुमन को .पी.नैयर के संगीत में बनी फ़िल्मआरपारके हिट गीतमोहब्बत कर को जी भर लो अजी किसने रोका है’  में रफ़ी और गीता का साथ देने का मौक़ा मिला था। सुमन के मुताबिक़ इस गीत में उनकी गायी एकाध पंक्ति को छोड़ दिया जाए तो उनकी हैसियत महज़ कोरस गायिका की सी रह गयी थी। .पी.नैयर के संगीत में उनका गाया ये इकलौता गीत साबित हुआ।

साल 1958 में मुंबई के एक व्यवसायी रामानंद कल्याणपुर से सुमन का विवाह हुआ और वो सुमन हेमाडी से सुमन कल्याणपुर बन गयीं। 1960 का दशक सुमन के लिए बेहद व्यस्तताओं भरा रहा। उन्होंने अपने  दौर के तक़रीबन सभी दिग्गज संगीतकारों के लिए गीत गाए। उनकी आवाज़ और गायकी काफ़ी हद तक लता मंगेशकर से मिलती थी और इसीलिए जब भी लता की अपने साथी संगीतकारों या गायकों से अनबन हुई तो उसका सीधा लाभ सुमन कल्याणपुर को मिला। उस दौर में ख़ासतौर से रफ़ी के साथ गाए उनके गीत बेहद कामयाब हुए।दिल एक मंदिर है, ‘तुझे प्यार करते हैं करते रहेंगे, ‘अगर तेरी जलवानुमाई होती, ‘मुझे ये फूल दे, ‘बाद मुद्दत के ये घड़ी आयी, ‘ जाने तमन्ना जाने बहारां, ‘तुमने पुकारा और हम चले आए, ‘अजहूं आए बालमा, ‘ठहरिए होश में लूं तो चले जाईएगा, ‘पर्वतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है, ‘ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे, ‘रहें ना रहें हम महका करेंगे, ‘इतना है तुमसे प्यार मुझे मेरे राजदारऔरदिले बेताब को सीने से लगाना होगाजैसे गीत उसी दौर में बने थे।


1970 के दशक में जैसे जैसे नए संगीतकार और गायक-गायिकाएं आते गए, सुमन कल्याणपुर की व्यस्तताएं कम होती चली गयीं। साल 1981 में बनी फ़िल्मनसीबकाज़िंदगी इम्तिहान लेती हैउनका आख़िरी रिलीज़ गीत साबित हुआ। 

1970 के दशक में जैसे जैसे नए संगीतकार और गायक-गायिकाएं आते गए, सुमन कल्याणपुर की व्यस्तताएं कम होती चली गयीं। साल 1981 में बनी फ़िल्मनसीबकाज़िंदगी इम्तिहान लेती हैउनका आख़िरी रिलीज़ गीत साबित हुआ। सुमन के मुताबिक, “फ़िल्मनसीबके बाद मुझे गायन के मौक़े अगर मिले भी तो वो गीत या तो रिलीज ही नहीं हो पाए और अगर हुए भी तो उनमें से मेरी आवाज़ नदारद थी। गोविंदा की फ़िल्मलव 86में मैंने एक सोलो और मोहम्मद अज़ीज के साथ एक युगलगीत गाया था। लेकिन जब वो फ़िल्म और उसके रेकॉर्ड रिलीज़ हुए तो मेरी जगह कविता कृष्णमूर्ति ले चुकी थीं। कुछ ऐसा ही केतन देसाई की फ़िल्मअल्लारक्खामें भी हुआ था जिसके संगीतकार अनु मलिक थे

क़रीब 28 साल के अपने करियर में सुमन कल्याणपुर ने सिर्फ़ पार्श्वगायन के क्षेत्र में अपना एक सम्मानजनक स्थान बनाया बल्कि रसरंग (नासिक) काफ़ाल्के पुरस्कार(1961), सुर सिंगार संसद कामियां तानसेन पुरस्कार(1965 और 1970),महाराष्ट्र राज्य फ़िल्म पुरस्कार(1965 और 1966),गुजरात राज्य फ़िल्म पुरस्कार(1970 से 1973 तक लगातार) जैसे क़रीब एक दर्जन पुरस्कार भी हासिल किए।

खार (पश्चिम) की आनंदकुंज नाम की जिस बिल्डिंग में सुमन कल्याणपुर रहती थीं उस जगह पर अब एक नयी बिल्डिंग बन गयी है। पूछताछ करने पर पता चला कि क़रीब 5 साल पहले सुमन के पति का निधन हुआ था और अब वो खार (पश्चिम) में ही रोड नंबर 12 पर अपनी शादीशुदा बेटी चारू अग्नि के साथ रहती हैं। इस दौरान वो साल 2010 में एक-दो सम्मान समारोहों में ज़रूर नजर आयीं जब महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें लता मंगेशकर पुरस्कार-2009’ से सम्मानित किया। लेकिन बाहरी लोगों से उनका सम्पर्क अब लगभग ख़त्म हो चुका है। यहां तक कि अब उन्हें किसी से फ़ोन पर बात करना भी मंज़ूर नहीं है। यही वजह है कि इस बार सुमन कल्याणपुर तक पहुंचने की हमारी तमाम कोशिशें नाकाम रहीं।

We are thankful to –

Mr. Harish Raghuvanshi & Mr. Harmandir Singh ‘Hamraz’ for their valuable suggestion, guidance, and support.

Mr. S.M.M.Ausaja for providing movies’ posters.

Mr. Sanjeev Tanwar for providing various B&W pictures.

Mr. Gajendra Khanna for editing English translation of the write up.

Mr. Manaswi Sharma for the technical support including video editing.


Dil Ne Phir Yaad Kiya Barq Si Laher Aayi Hai” – Suman Kalyanpur

                                          ……….Shishir Krishna Sharma        

Suman Kalyanpur is the owner of a very melodious voice. She succeeded in achieving recognition of her own during the years of Lata Mangeshkar’s monopoly and sang under the baton of almost all the top composers of the period. Many people rightly believe that she could not reach the stature and position which her talent really warranted. In spite of having all the mandatory characteristics required to make a mark in the field of playback singing like great knowledge of classical music, a melodious voice and a wide range, the Hindi cine world never let Suman Kalyanpur come out from the shadow of Lata Mangeshkar. During her career spanning nearly 3 decades, she sang more than 3000 film as well as non-film songs and ghazals in around a dozen languages and dialects including Hindi, Marathi, Gujrati, Panjabi and Bhojpuri before bidding adieu to the film world as public taste changed.

I met Suman Kalyanpur a couple of years back at her Khar (West) home. During that meeting, she spoke in detail about her personal and professional life. Suman Kalyanpur’s father Shankar Rao Hemadi hailed from an elite Saraswat Brahmin family belonging to Mangalore, Karnataka. He served on a top post in the Central Bank Of India and was posted to Dhaka (now Bangladesh) for a very long period. Suman Kalyanpur was born on 28th January 1937 in Kolkata. Apart from father and mother Seeta Hemadi, there were 5 daughters and one son in the family with Suman being the eldest among her siblings. The family shifted to Mumbai in the year 1942.

Suman had always been interested in Painting and Music. After completing schooling from Mumbai’s famed Columbia High School, She got admission in the prestigious Sir J.J.School Of Arts for further studies in Painting. Simultaneously, she started learning classical vocal from Pune’s Prabhat Films’ music director and a close family friend, ‘Pandit Keshav Rao Bhole’. According to Suman, initially singing was just hobby to her but gradually her interest in music increased and She started learning it professionally from ‘Ustad Khan Abdul Rehman Khan’ and ‘Guruji Master Navrang’.

According to Suman, “Everybody at home was inclined towards arts and music but public performances were strictly prohibited. Still, I could not say ‘no’ to an offer to sing for the All India Radio in 1952. This was my first public performance after which I got a chance to sing for the Marathi film ‘Shukrachi Chandni’ released in the year 1953. At that time, Sheikh Mukhtar was making the film ‘Mangu’ whose composer was ‘Mohammed Shafi’. Sheikh Mukhtar was so impressed with my ‘Shukrachi Chandni’ songs, that he got me to sing 3 songs for the film ‘Mangu’. However, due to some unknown reasons, later ‘O.P,Nayyar’ replaced ’Mohammed Shafi’ and only one of my 3 songs, a lullaby “Koi Pukaare Dheere Se Tujhe” was retained in the film. Thus, I entered Hindi cinema with the 1954 release ‘Mangu’.

Immediately after the film ‘Mangu’, Suman sang 5 songs under the baton of composer ‘Nashaad’ for the film ‘Darwaza’ (1954), which was produced by Ismat Chugtai and directed by Shahid Lateef. Since ‘Darwaza’ released first, it is generally believed to be Suman Kalyanpur’s first Hindi film. In the same year (1954), Suman sang the film version of O.P.Nayyar’s hit ensemble song ‘Mohabbat Kar Lo Ji Bhar Lo Aji Kisne Roka Hai’ with Rafi and Geeta Dutt for the film ‘Aar Paar’. According to Suman, She had a couple of solo lines to sing and her services were used, more, as a chorus singer in this song. This proved to be the only song she ever sang for O.P.Nayyar.

Suman married a Mumbai based businessman Ramanand Kalyanpur in the year 1958 and thus, became Suman Kalyanpur from Suman Hemadi. Suman was at the peak of her career in the 1960s. She sang for almost all the ace composers of the time. Her voice and style of singing was so close to Lata Mangeshkar’s that whenever there was a rift between Lata and her composers or co-singers, Suman Kalyanpur was the one who benefitted from it. Her songs with Rafi recorded during that period especially proved to be big hits.

These include gems like ‘Dil Ek Mandir Hai’, ‘Tujhe Pyaar Karte Hain Karte Rahenge’, ‘Agar Teri Jalwanumaai Na Hoti’, ‘Mujhe Ye Phool Na De’, ‘Baad Muddat Ke Ye Ghadi Aayi’, ‘Aye Jaan-e-tamanna Jaan-e-baharaan’, ‘Tumne Pukara Aur Hum Chale Aaye’, ‘Ajahu Na Aaye Baalma’, ‘Thaheriye Hosh Mein Aa Loon To Chale Jaaiyega’, ‘Parvaton Ke Pedon Par Shaam Ka Basera hai’, ‘Na Na Karte Pyaar Tumhi Se Kar Baithe’, ‘Rahein Na Rahein Hum Mehka Karenge’, ‘Itna Hai Tumse Pyaar Mujhe Mere Raazdaar’ and ‘Dil-e-Betaab Ko Seene Se Lagaana Hoga’.

With the arrival of a new generation of composers and singers in the 1970s, Suman Kalyanpur’s assignments gradually dwindled. The ensemble song ‘Zindagi Imtehan Leti Hai’ for the 1981 release ‘Naseeb’ proved to be her last released song. According to Suman, “the songs which I recorded after ‘Naseeb’ either remained unreleased or were released with another voice as my part had been dubbed by some other singer. I sang a solo and one duet with Mohammed Aziz in the Govinda starrer film ‘Love 86’. But when the film and its music released, the songs had Kavita Krishnamurthy singing them in my place. The same thing happened in Ketan Desai’s film ‘Alla-rakha’ with Anu Malik as the composer”. 

During her nearly 28 year long career, Suman Kalyanpur not only achieved a respectable position in the field of playback singing but also won approximately a dozen awards including ‘Phalke puraskar’ (1961) from Rasrang (Nasik), Sur Singar Sansad’s ‘Miyaan Tansen Puraskar’ (1965 & 1970), ‘Maharashtra State Film Award’ (1965 & 1966) and the ‘Gujrat State Film Award’ (1970 to 1973).

Now, a new building has replaced the original building named Anand Kunj in Khar (West) which had Suman Kalyanpur’s residence. On investigation, we came to know, that, after her husband’s death around 5 years back, Suman ji now lives with her married daughter Charu Agni at Khar (West)’s Road no. 12. She was publicly seen in a couple of felicitation functions in 2010 when she was awarded with ‘Lata Mangeshkar Puraskar-2009’ by the Maharashtra Government. But, now, she has turned reclusive and doesn’t entertain outsiders. Attempts to contact her on the phone have also been thwarted as she refuses to, even, attend the calls. Due to this, we failed to reach her this time for further discussions on her career.