Tuesday, June 4, 2013

‘Powerful Actor, Superfine Painter’ - Iftekhar

दमदार अभिनेता, बेहतरीन चित्रकार” – इफ़्तेख़ार

                   ........शिशिर कृष्ण शर्मा

सैयदाना इफ़्तेख़ार अहमद शरीफ़ !...एक बेमिसाल अभिनेता जिन्हें हम इफ़्तेख़ार के नाम से जानते हैं। इस नाम का ज़िक्र होते ही हमारे जहन में सिनेमा के परदे पर नज़र आने वाले एक पुलिस ऑफ़िसर की छवि उभरती है। लेकिन आम दर्शक शायद इस बात से वाक़िफ़ नहीं हैं कि वोही इफ़्तेख़ार सिर्फ़ एक बेहतरीन गायक और चित्रकार थे, बल्कि अभिनय के शुरूआती दौर में कुछ फ़िल्मों में बतौर हीरो भी नज़र आए थे। हाल ही में हमारी मुलाक़ात इफ़्तेख़ार साहब की बेटी सलमा से हुई और उस मुलाक़ात के दौरान सलमा जी ने अपने पिता के बारे में हमारे साथ विस्तार से बातचीत की।  

मूलत: जालंधर के रहने वाले इफ़्तेख़ार के पिता कानपुर में एक कंपनी में ऊंचे ओहदे पर थे। चार भाई और एक बहन में सबसे बड़े इफ़्तेख़ार का जन्म 26 फ़रवरी 1922 को जालंधर में हुआ था लेकिन उनका बचपन कानपुर में गुज़रा। मैट्रिक के बाद उन्होंने लखनऊ कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स से चित्रकला में डिप्लोमा लिया।

इफ़्तेख़ार को गाने का बेहद शौक़ था। वो सहगल के दीवाने थे और उन्हीं जैसा मशहूर गायक बनना चाहते थे। चूंकि उस ज़माने में तमाम बड़ी म्यूज़िक कंपनियां कोलकाता में थीं इसलिए क़रीब 20 साल की उम्र में इफ़्तेख़ार कोलकाता चले आए।

उस दौर के मशहूर संगीतकार कमल दासगुप्ता एच.एम.वी. (कोलकाता) में नौकरी करते थे। कोलकाता केएम.पी.प्रोडक्शनकी साल 1941 में बनी हिट फ़िल्मजवाबका संगीत कमल दासगुप्ता ने ही तैयार किया था। उस फ़िल्म का, काननदेवी का गाया गीततूफ़ानमेल...दुनिया ये दुनिया तूफ़ान मेलआज भी उतना ही लोकप्रिय है। कमल दासगुप्ता ने एच.एम.वी.कंपनी में इफ़्तेख़ार का ऑडिशन लिया। एच.एम.वी. ने इफ़्तेख़ार के गाए दो गीतों का एक प्राईवेट अलबम जारी किया, जिसके बाद वो वापस कानपुर लौट गए। लेकिन कुछ ही दिनों बाद उन्हेंएम.पी.प्रोडक्शनकी तरफ़ से एक टेलिग्राम मिला जिसमें उनसे तुरंत कोलकाता आने को कहा गया था। दरअसल इफ़्तेख़ार के बेहद संभ्रांत व्यक्तित्व और साफ़ ज़ुबान से कमल दासगुप्ता इतने प्रभावित हुए, कि उन्होंनेएम.पी.प्रोडक्शनसे इफ़्तेख़ार को बतौर अभिनेता नौकरी देने की सिफ़ारिश कर डाली थी।

कानपुर में सईदा नाम की लड़की के साथ इफ़्तेख़ार का रिश्ता तय हो चुका था। एम.पी.प्रोडक्शनसे बुलावा आया तो वो कोलकाता आकर कंपनी में नौकरी करने लगे थे। लेकिनएम.पी.प्रोडक्शनके बैनर में लंबे समय तक इफ़्तेख़ार की फ़िल्म शुरू ही नहीं हो पाई। उसी दौरान कोलकाता में अपनी ही बिल्डिंग में रहने वाली यहूदी लड़की हना जोसेफ़ से उन्हें इश्क़ हो गया और सईदा के साथ हुआ रिश्ता तोड़कर इफ़्तेख़ार ने हना से शादी कर ली। शादी के बाद हना जोसेफ को नया नाम मिला, रेहाना अहमद।

इफ़्तेख़ार की पहली फ़िल्मआर्ट फ़िल्म्स-कोलकाताके बैनर में बनीतक़रारथी जो साल 1944 में रिलीज़ हुई थी। इस फ़िल्म की नायिका उस जमाने की स्टार अभिनेत्री जमुना थीं। साल 1945 में इफ़्तेख़ार की दो फ़िल्मेंघरऔरराजलक्ष्मीरिलीज़ हुईं।घरकी नायिका जमुना औरराजलक्ष्मीकी नायिका कानन देवी थीं। एम.पी.प्रोडक्शनके बैनर में बनी फ़िल्मराजलक्ष्मीसे ही तलत महमूद ने भी बतौर गायक और अभिनेता अपना करियर शुरू किया था।

साल 1947 में इफ़्तेख़ारऐसा क्योंऔरतुम और मैंफ़िल्मों में नज़र आए। उसी दौरान साल 1946 में उनकी बड़ी बेटी सलमा का जन्म हुआ और 1947 में उनकी पत्नी ने छोटी बेटी को जन्म दिया, जिसका नाम सईदा रखा गया।

बंटवारे के दौरान इफ़्तेख़ार के माता-पिता, भाई-बहन सहित सभी क़रीबी रिश्तेदार पाकिस्तान चले गए। इफ़्तेख़ार ने भारत में ही रहना बेहतर समझा, हालांकि दंगे-फ़साद की वजह से उन्हें कोलकाता छोड़ना पड़ा। साल 1948 में वो पत्नी और दोनों बेटियों को साथ लेकर मुंबई चले आए और खार स्थित एवरग्रीन होटल को उन्होंने अपना ठिकाना बना लिया। संघर्ष का दौर एक बार फिर से शुरू हुआ।  लेकिन काम मिलना आसान नहीं था। सलमा जी कहती हैं, “हम दोनों बहनें बहुत छोटी थीं और अक्सर हमारे खाने तक के लिए घर में कुछ नहीं होता था। घर की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए मम्मी को किन्हीं मिस्टर पाटनवाला के ऑफ़िस में सेक्रेट्री की नौकरी करनी पड़ी। उधर छोटा-मोटा जैसा भी काम मिलता रहा डैडी करते रहे। लेकिन हमारे माली हालात में कोई बदलाव नहीं आया

कोलकाता में एक बार कानन देवी ने इफ़्तेख़ार का परिचय अशोक कुमार से कराया था। मुंबई आने पर इफ़्तेख़ारबॉम्बे टॉकीज़में अशोक कुमार से मिले। अशोक कुमार ने सिर्फ़ इफ़्तेख़ार को पहचाना बल्कि साल 1950 में बनी बॉम्बे टॉकीज़ की फ़िल्ममुक़द्दरमें उन्हें एक अहम भूमिका भी दी। आगे चलकर अशोक कुमार ने इफ़्तेख़ार से पेंटिंग भी सीखी और उम्र में उनसे काफ़ी बड़ा होने के बावजूद वो इफ़्तेख़ार को हमेशा पेंटिंग का अपना गुरू मानते रहे। इफ़्तेख़ार कितने बेहतरीन चित्रकार थे, इसका पता उन पेंटिंग्स से चलता है जो उन्होंने ख़ासतौर से फ़िल्मदूर गगन की छांव मेंके शीर्षक गीत की बैकग्राऊंड के लिए बनाई थीं।

1950 और 60 के दशकों में इफ़्तेख़ार नेसगाई” “साक़ी”, “आबशार”, “आगोश”, “बिराज बहू”, “मिर्ज़ा ग़ालिब”, “देवदास”, “श्री 420”, “समंदरी डाकू”, “अब दिल्ली दूर नहीं”, “दिल्ली का ठग”, “रागिनी”, “बेदर्द ज़माना क्या जाने”, “कंगन”, “नाचघर”, “छबीली”, “कल्पना”, “कानून”, “प्रोफेसर”, “रंगोली”, “बंदिनी”, “मेरी सूरत तेरी आंखें”, “दूर गगन की छांव में”, “संगम”, “शहीद”, “फूल और पत्थर”, “तीसरी क़सम”, “तीसरी मंज़िल”, “हमराज़”, “संघर्ष”, “आदमी और इंसानऔरइंतकामजैसी क़रीब 70 फ़िल्मों में छोटी-बड़ी सभी तरह की भूमिकाएं कीं लेकिन उनकी कोई ख़ास पहचान नहीं बन पायी। संघर्ष बदस्तूर जारी रहा। और फिर आयी फ़िल्मइत्तेफ़ाक़

साल 1969 में बनीबी.आर.फ़िल्म्सकी फ़िल्मइत्तेफ़ाक़में इफ़्तेख़ार पुलिस इंस्पेक्टर की अहम भूमिका में नज़र आए थे। सलमा जी कहती हैंफ़िल्मइत्तेफ़ाक़ने हमारी ज़िंदगी ही बदल डाली। पुलिस की वर्दी डैडी पर इतनी जमी कि उसके बाद उन्हें काम की कमी नहीं रही। बहुत जल्द उन्होंने ख़ार में अपना फ़्लैट भी ख़रीद लिया। इसका श्रेय मैं अशोक कुमार अंकल को देना चाहूंगी जिनकी सिफ़ारिश पर डैडी कोबी.आर.फ़िल्म्समें एंट्री मिली थी औरइत्तेफ़ाक़से पहले वो उस बैनर कीकानून”, “हमराज़औरआदमी और इंसानजैसी फ़िल्मों में भी काम कर चुके थे। हालांकि मैं तब तक शादी करके मुंबई छोड़ चुकी थी

सलमा जी की शादी साल 1964 में देहरादून के एक रईस ख़ानदान से ताल्लुक़ रखने वाले विपिनचन्द्र जैन से हुई थी। विपिनचन्द्र जैन एक्टर बनने मुंबई आए थे और सलमा जी से उनका ये प्रेमविवाह था। विपिनचन्द्र जैन के दादा रायबहादुर उग्रसेन जैन देहरादून के मशहूर कारोबारी थे जो नगरपालिका के चेयरमैन भी रह चुके थे। शादी के बाद सलमा जी पति के साथ देहरादून चली गयीं। क़रीब 15 साल उन्होंने देहरादून में गुज़ारे जहां वो एक कॉलेज में अंग्रेज़ी पढ़ाती थीं। उस दौरान उन्होंने एक बेटे और एक बेटी को जन्म दिया लेकिन पति से तलाक़ हो जाने के बाद वो साल 1979 में वापस मुंबई लौट आयीं। फिर क़रीब 20 सालों तक उन्होंने सेक्रेट्री और मैनेजर के तौर पर निर्माता एन.सी.सिप्पी का ऑफ़िस संभाला।

उधर इफ़्तेख़ार के लिए 1970 और 80 के दशक बेहद व्यस्तताओं भरे रहे। कामयाबी के उस दौर में उन्होंनेशर्मीली”, “महबूब की मेहंदी”, “गैंबलर”, “कल आज और कल”, “हरे रामा हरे कृष्णा”, “जवानी दीवानी”, “अचानक”, “ज़ंजीर”, “मजबूर”, “दीवार”, “धर्मात्मा”, “शोले”, “कभी कभी”, “दुल्हन वोही जो पिया मन भाए”, “डॉन”, “त्रिशूल”, “नूरी”, “काला पत्थर”, “कर्ज़”, “दोस्ताना”, “रॉकी”, “साथ साथ”, “राजपूत”, “सदमा”, “इंक़लाब”, “जागीर”, “तवायफ़”, “अंगारेऔरआवामजैसी कई फ़िल्मों में अभिनय किया। 50 साल के अपने करियर के दौरान उन्होंने क़रीब 300 फ़िल्मों में अभिनय किया औरबेख़ुदी(1992) औरकाला कोट(1993) उनकी आख़िरी फ़िल्मों में से थीं।  

सलमा जी बताती हैं, “परिवार के तमाम सदस्यों के पाकिस्तान चले जाने के बाद भी उनके साथ हमारा संपर्क बना रहा। मेरे बड़े चाचा (स्वर्गीय) इम्तियाज़ अहमद पाकिस्तान टीवी के मशहूर अभिनेता थे और उन्हें पाकिस्तान सरकार ने नेशनल अवॉर्ड से नवाज़ा था। उनसे छोटे मुश्ताक अहमद पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाईंस में पायलट थे और अब वो अमेरिका में रहते हैं। इकलौती बुआ शमीम कराची में रहती थीं लेकिन अब वो ज़िंदा नहीं हैं। डैडी के सौतेले भाई और सबसे छोटे इक़बाल अहमद चाचा और उनकी पत्नी डॉक्टर हैं और वो भी अमेरिका में रहते हैं। पाकिस्तान की यात्रा के दौरान एक बार रावलपिंडी में मेरी मुलाक़ात उन सईदा से भी हुई थी जिनका रिश्ता कानपुर में डैडी के साथ हुआ था। वो मुझसे बेहद गर्मजोशी से मिलीं। तब मुझे पता चला कि उन्होंने ज़िंदगी भर शादी ही नहीं की 

(विशेष  :  आम धारणा है कि अभिनेत्री वीणा इफ़्तेख़ार की बहन थीं लेकिन ये सच नहीं है| सलमा जी के अनुसार वीणा और इफ़्तेख़ार का रिश्ता केवल पारिवारिक मित्रता का था| इफ़्तेख़ार की सिर्फ एक ही बहन थीं जिनका ज़िक्र ऊपर किया जा चुका है|)   

इफ़्तेख़ार की छोटी बेटी सईदा के पति एम.आई.शेख जुहू-मुंबई में रहते हैं। वो सिएट टायर्स में मैनेजर के ओहदे पर थे और सईदा से उनके दो बच्चे हैं। एक रोज़ पता चला कि सईदा को कैंसर है। क़रीब 5 सालों तक वो अपनी बीमारी से लड़ती रहीं। और फिर 7 फ़रवरी 1995 को वो अपनी लड़ाई हार गयीं। बेटी की मौत के सदमे को इफ़्तेख़ार बर्दाश्त नहीं कर पाए और अचानक ही उनकी डायबिटीज़ बहुत ज़्यादा बढ़ गयी। उन्हें मुंबई के उपनगर मालाड (पूर्व) स्थितसूचक अस्पतालमें भरती कराया गया लेकिन उनकी हालत बिगड़ती चली गयी। आख़िरकार बेटी की मौत के महज़ 24 दिनों बाद, 1 मार्च 1995 को इफ़्तेख़ार भी चल बसे।

सलमा जी से हमारी मुलाक़ात 15 अप्रैल 2013 की शाम अंधेरी (पश्चिम) के सात बंगला इलाक़े में स्थित उनके फ़्लैट पर हुई थी। उस मुलाक़ात के दौरान हमारे साथ देहरादून के वरिष्ठ रंगकर्मी गजेन्द्र वर्मा भी मौजूद थे जो उन दिनों निजी काम के सिलसिले में मुंबई आए हुए थे। सलमा जी ने बताया कि उनकी बेटी की शादी हो चुकी है और वो लंदन में रहती हैं। उनके बेटे विशाल जैन मुंबई में रहते हैं लेकिन उन दिनों वो पारिवारिक काम के सिलसिले में देहरादून में थे। सलमा जी ने हमें अपनी अम्मी श्रीमती हना जोसेफ उर्फ़ रेहाना अहमद से भी मिलवाया। 90 साल की श्रीमती रेहाना अहमद उन दिनों बेहद बीमार चल रही थीं।

हाल ही में सलमा जी ने हमें फ़ोन करके बेहद दुखद सूचना दी कि बीते 27 मई  (2013) को उनकी अम्मी का इंतकाल हो गया है।               



We are thankful to –

Mr. Harish Raghuvanshi & Mr. Harmandir Singh ‘Hamraz’ for their valuable suggestion, guidance, and support.

Mr. S.M.M.Ausaja for providing movies’ posters.

Ms. Maitri Manthan for editing the English translation of the write up.

Mr. Manaswi Sharma for the technical support including video editing.

Mr. Harish Raghuwanshi (Surat) & Mr. Iqbal Rizvi (IBN7-N.Delhi) for giving some of important inputs. 


Powerful Actor, Superfine Painter” – Iftekhar

                              …..Shishir Krishna Sharma

Sayyadana Iftekhar Ahmed Shareef! …a superfine actor who is known to us as Iftekhar. This name reminds us of a police officer often seen on the silver screen. But perhaps the film buffs are not aware that the same Iftekhar was not only a wonderful singer and painter, but he also played the main lead in a couple of movies initially. Recently we met Iftekhar Saheb’s daughter Salma who spoke about her father to us in details.

Originally from Jalandhar, Iftekhar’s father was in a top position in some company in Kanpur. Eldest among 4 brothers and one sister, Iftekhar was born on 26th February 1922 in Jalandhar and his childhood was spent in Kanpur. After completing his matriculation, he did a diploma course in painting from Lucknow College of Arts. He had a passion for singing and was so impressed with Sehgal that he dreamt to become a singer of Sehgal’s stature. Since all the ‘that time’ big music companies were based in Kolkata, Iftekhar came down to the city at the age of 20.

In those days, renowned composer Kamal Dasgupta was serving for HMV (Kolkata). He had already composed for Kolkata based “M.P.Production’s” 1941 release “Jawaab”. Kanan Devi sung “toofan mail…duniya ye duniya toofan mail” of that movie continues to be famous even today. Iftekhar passed the audition test taken for HMV by Kamal Dasgupta. The company released a private album with 2 songs of Iftekhar’s who then returned to Kanpur. Few days later he received a telegram from “M.P.Production” in which he was asked to immediately reach Kolkata. In fact Kamal Dasgupta was so impressed with Iftekhar’s elite personality and sophisticated language that he recommended his name to “M.P.Production” and asked the banner to give Iftekhar the job of an actor.    

While in Kanpur, Iftekhar had been engaged with a girl named Saeeda. When called by “M.P.Production” he reached Kolkata and joined the company. But no film of Iftekhar’s could take off for long under the banner of “M.P.Production”. During those days in Kolkatta, he fell in love with Hannah Joseph, a Jewish girl living in his building. He severed ties with Sayeeda and married Hannah. After marriage Hannah Joseph was rechristened as Rehana Ahmed.

Iftekhar’s debut film was 1944 releaseTaqraarwhich was made under the banner of Art Films-Kolkata. Heroine of this film was that time star actress Jamuna. In the year 1945, there released two of Iftekhar’s movies titled “Ghar” and “Rajlaxmi” respectively with Jamuna and Kanan Devi in the main lead. “Rajlaxmi”, which was made under the banner of M.P.Production” was also the debut movie of Talat Mehmood’s as singer as well as actor.  Iftekhar was then seen in the movies “Aisa kyon” and “Tum Aur Mai”, both 1947 releases. Meanwhile his elder daughter Salma was born in the year 1946 and the younger one in 1947 who was named Saeeda.  

Many of Iftekhar’s close relations including his parents and siblings migrated to Pakistan. Iftekhar preferred to stay in India though due to riots he was forced to leave Kolkata. He, along with his wife and daughters came down to Mumbai in the year 1948 and stayed in Hotel Evergreen at Khar. Once again, the life had come to zero and the struggle started once again but it was not easy to find the work. Salma ji says, “We the sisters were still toddlers and often there remained no food for us at home. Ultimately my mom had to work as secretary to one Mr. Patanwala to fulfill the basic household needs whereas dad continued with whatever small or big work, he got but our financial conditions didn’t change”.

While in Kolkata, Iftekhar was once introduced to Ashok Kumar by Kanan Devi.  After reaching Mumbai, Iftekhar met Ashok Kumar at Bombay Talkies. Ashok Kumar not only recognized Iftekhar but also gave him an important role in “Bombay Talkie’s” 1950 release “Muqaddar”. Ashok Kumar later learnt painting from Iftekhar. In spite being many years older than Iftekhar, Ashok Kumar always considered him as his painting “guru”. Iftekhar’s caliber as painter is proved by the background paintings, he made especially for the title song of the movie “door gagan ki chhaon me”.

During 1950’ and 60’s Iftekhar played all kind of small-big roles in approximately 70 movies including “sagai”, “saaqi”, “aabshaar”, “aagosh”, “biraj bahu”, “mirza ghalib”, “devdas”, “shri 420”, “samandari daku”, “ab dilli door nahin”, “dilli ka thug”, “ragini”, “bedard zamana kya jaane”, “kangan”, “naachghar”, “chhabili”, “kalpana”, “kanoon”, “professor”, “rangoli”, “bandini”, “meri soorat teri ankhein”, “door gagan ki chhaon me”, “sangam”, “shaheed”, “phool aur patthar”, “teesri kasam”, “teesri manzil”, “hamraz”, “sangharsh”, “aadmi aur insaan” and “inteqaam” but he failed to get much recognition. Struggle remained never ending. And then released “Ittefaaq”.

Iftekhar played a cop in “Ittfaaq”, which was made under the banner of “B.R.Films” in the year 1969. Salma ji says, “movie “Ittefaaq” completely changed our lives. Cop’s uniform so suited daddy that he instantly became very busy. Even he bought his own flat in Khar.  And the credit of all this goes to Ashok Kumar uncle who on recommendation daddy was given entry into “B.R.Films” and prior to “Ittfaaq”, he had worked in the movies “kanoon”, “hamraz” and “aadmi aur insaan” of the same banner, though I had already left Mumbai by then due to my marriage”.

Salma ji got married in the year 1964 to one Mr. Vipin Chandra Jain who was from a very rich family from Dehradoon. Vipin Chandra Jain had come to Mumbai to join Hindi movies as an actor and this was his love marriage with Salma ji. Vipin Chandra Jain’s grandfather, the renowned entrepreneur Raibahadur Ugrasen Jain had been the chairman of Dehradoon Municipal Corporation as well. After her marriage, Salma ji shifted to Dehradoon with her husband. She spent 15 years in Dehradoon where she taught English in a college. Meanwhile she became the mother of a son and a daughter but eventually had to come back to Mumbai after her divorce from her husband in the year 1979. For the next 20 years she looked after producer N.C.Sippi’s office as his secretary and the manager.  

For Iftekhar, the 1970’s and 80’s were the busiest decades of his career. During that period of success he acted in hundreds of movies like “sharmili”, “mehboob ki mehndi”, “gambler”, “kal aaj aur kal”, “hare rama hare Krishna”, “jawani deewani”,  “achanak”, “zanjeer”, “majboor”, “deewar”, “dharmatma”, “sholey”, “kabhi kabhi”, “dulhan wohi jo piya mann bhaaye”, “don”, “trishool”, “noorie”, “kaala patthar”, “karz”, “dostana”, “rocky”, “saath saath”, “rajpoot”, “sadma”, “inqalaab”, “jageer”, “tawaif”, “angaare” and “awaam”. As per an estimate he acted in approximately 300 movies during his career spanning 5 decades. “Bekhudi” (1992) and “kaala coat” (1993) are among the last films he acted in.  

Salma ji says, “even after all our family members shifted to Pakistan, we remained in touch. My elder chachaji (late) Mr.Imtiaz  Ahmed was a famous actor on Pakistan T.V. who was honored with the National Award by Pakistan Government. Second chacha Mushtaq Ahmed was a pilot with Pakistan International Airlines and is now settled in US. Daddy’s only sister Shamim aunty lived in Karachi but she is no more now. Youngest Iqbal Ahmed chacha who was daddy’s stepbrother and his wife are doctors and they also reside in US. During one of my Pakistan journeys I also met Saeeda in Rawalpindi, the same girl who was once engaged to daddy in Kanpur. I still remember the warmth she met me with, and it was emotional to know that she had decided to remain unmarried forever. Yes, she never married”.

(Special note: There is a general perception that actress Veena was Iftekhar’s sister, but this is not true. According to Salma ji, Veena and Iftekhar were just family friends. Iftekhar had only one sister as mentioned above.)  

Iftekhar’s younger daughter Saeeda’s husband M.I.Sheikh stays at Juhu-Mumbai. He was a manager with CIAT tyres and has 2 kids from Saeeda.  One day Saeeda was detected with cancer. She bravely fought with the ailment for 5 years but lost the battle on 7th February 1995. It was hard for Iftekhar to cope with daughter’s demise. Eventually his diabetes suddenly shot up very high. He was admitted to the “Suchak Hospital” at Malad (East) but his condition kept on deteriorating and he died on 1st March 1995, exactly after 24 days of his daughter’s death.

Our meeting with Salma ji took place in the evening of 15th April 2013 at her flat situated at Seven Bungalows area of Andheri (West).  Mr. Gajendra Verma, the renowned and very senior theatre person from was also present during the said meeting who was in Mumbai for few days for some personal work. Salma ji said that her daughter is married and settled in London. Salma ji’s son Vishal Jain resides in Mumbai but at that time he was in Dehradoon for some family related work. Salma ji introduced us to her mom Smt. Hanna Joseph alias Rehana Ahmed. 90 years old Smt. Rehana Ahmed was very ill for some time. Recently Salma ji called us and informed that her mom died on the 27th May (2013) which was indeed a tragic news.

Team “Beete Hue Din” pays heartfelt homage to (Late) Smt. Rehana Ahmed w/o (Late) Iftekhar’s on her sad demise!         


9 comments:

  1. Very rare information. Some of them was never known. Thanx for this.

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  2. Lekh bahut sundar ban padaa hai. Bahut si jaankaari mili. Iftekhar Sahab aur Jagdish Raj - Ye dono kabhi bhi police officer ke roop mein acting karte naheen deekhe, ekdam Naisargik abhinay hotaa thaa unka. Aawaz to maano police officer ke liye hi banee thee Iftekhar sahab ki. Bahut hi badhiya lagaa yeh lekh. Mujhe afsos hota hai ki jis samay unki mrityu hui, main filmi duniya ke halchal se apne aapko ekdam kaat chukaa thaa........pataa hi naheen chal paayaa thaa. Dukh ki baat ki Mrs. bhi chal baseen. Bhagwaan un dono ki aatmaa ko jannat bakshe. Thank you Shishir Krishna Sharma bhai, itna badhiya lekh dene ke liye.

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  3. Just stumbled upon this blog,was bowled over by all the detailed information. Great job.

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  4. Wow !! Such a detailed and informative article ..

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  5. I heard that actor Iftekhar was the elder brother of actress Veena ( Toujour Sultana ) who played the role of Nawab Jaan in the film Pakeezah ... Is this information correct ?

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  6. Salma jee aajkal dehradun mai hai. achanak vo bimar ho gai tee ab teek hai aaj hee vo Basera house mai ahi hai unki dost Smt. Shakuntal Singh Kai Ghar Baser House Mohabewal Dehradun mai phale sai kuch achi tabiyat hai.

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  7. Vipin Chandra was not the grandson of Rai Bahadur Ugra Sen and was the grandson of his elder brother Lala Phool Chand

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  8. Informative, I used to read such articles, very much like beete hue din blog spot

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  9. Very informative article, I have the habit of reading beete hue din blogspot

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