Tuesday, October 29, 2013

“Neend Hamaari Khwaab Tumhare” - Prabhat Film Company

नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे” - प्रभात फ़िल्म कंपनी

                             ........शिशिर कृष्ण शर्मा

(‘बीते हुए दिनके अभिन्न अंग श्री गजेन्द्र खन्ना द्वारा संचालित वेबसाईट www.anmolfankaar.com में सर्वप्रथम प्रकाशित|)

1930 के दशक में कोलकाता कीन्यू थिएटर, ‘माडन थिएटरऔर मुंबई कीरणजीत मूवीटोन, ‘बॉम्बे टॉकीज़औरवाडिया मूवीटोनजैसी अग्रणी फ़िल्म कंपनियों के बीच एक सम्मानित नाम था पुणे कीप्रभात फ़िल्म कंपनीका, जिसे आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में 50 से ज़्यादा उद्देश्यपूर्ण फ़िल्मों के योगदान के लिए याद किया जाता है।प्रभात फ़िल्म कंपनीने मराठी भाषा की पहली टॉकी फ़िल्म का निर्माण तो किया ही था, हिंदी सिनेमा की पहली संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम, निर्देशक प्यारेलाल संतोषी और देवआनंद, गुरूदत्त और बेगमपारा जैसे कलाकार भी इसी संस्था की देन थे। साल 1937 के वेनिस फ़िल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार जीतने वाली पहली भारतीय फ़िल्म, मराठी भाषा में बनीसंत तुकारामका निर्माण भीप्रभातके बैनर में ही किया गया था।

प्रभात फ़िल्म कंपनीकी स्थापना वी.शांताराम और उनके चार साथियों, विष्णुपंत दामले, शेख फ़त्तेलाल, केशवराव धायबर और सीताराम बी.कुलकर्णी ने मिलकर की थी। शांताराम, दामले, फ़त्तेलाल और धायबर साईलेंट फ़िल्मों के ज़माने में मशहूर चित्रकार और फ़िल्मकार बाबूराव पेंटर की कोल्हापुर स्थितमहाराष्ट्र फ़िल्म कंपनीमें काम करते थे। इन चारों ने साल 1929 मेंमहाराष्ट्र फ़िल्म कंपनीसे इस्तीफ़ा देने के बाद कोल्हापुर के मशहूर कारोबारी सीताराम बी.कुलकर्णी द्वारा दी गयी आर्थिक मदद से और उनकी पार्टनरशिप मेंप्रभात फ़िल्म कंपनीकी नींव रखी थी। संस्था के प्रतीकचिह्न (लोगो) के तौर पर, महाराष्ट्र की संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाला वाद्यतुतारी’ (तुरही) बजाती हुई स्त्री को चुना गया था।


साल 1929 में बनीगोपालकृष्णइस बैनर की पहली फ़िल्म थी जिसके निर्देशक वी.शांताराम और कलाकार सुरेश, कमला देवी, अनंत आप्टे और बजरबट्टू थे।गोपालकृष्णके बादप्रभातके बैनर में और भी पांच साईलेंट फ़िल्मेंउदयकाल, ‘ख़ूनी ख़ंजर, ‘रानी साहिबा’ (सभी 1930), ‘ज़ुल्मऔरचन्द्रसेना’ (दोनों 1931) बनीं। इनमें सेउदयकालऔरचन्द्रसेनाका निर्देशन वी.शांताराम ने, ‘ज़ुल्मका निर्देशन केशवराव धायबर ने औरख़ूनी ख़ंजरऔररानी साहिबाका निर्देशन वी.शांताराम-धायबर की जोड़ी ने किया था। वी.शांताराम नेउदयकालमें अभिनय भी किया था।

प्रभातके बैनर की पहली टॉकी फ़िल्मअयोध्या का राजाथी जो साल 1932 में प्रदर्शित हुई थी। हिंदी के साथ-साथ ये फ़िल्मअयोध्येचा राजाके नाम से मराठी भाषा में भी बनी थी।अयोध्येचा राजामराठी भाषा में बनी पहली टॉकी फ़िल्म थी। इस द्विभाषी फ़िल्म के निर्देशक वी.शांताराम, संगीतकार पंडित गोबिंदराव टेंबे और मुख्य कलाकार दुर्गा खोटे, मास्टर विनायक, गोबिंदराव टेंबे, बाबूराव पेंढारकर और निंबालकर थे। अभिनेत्री नंदा इन्हीं मास्टर विनायक की बेटी हैं।


साल 1932 मेंप्रभातको कोल्हापुर से पुणे स्थानांतरित कर दिया गया। उसी सालप्रभातके बैनर में दो और द्विभाषी फ़िल्मेंजलती निशानी’ (मराठी मेंअग्नि कंकण’) औरमाया मछिंदरबनीं। साल 1933 में इस बैनर ने रंगीन फिल्मसैरंध्रीऔर तमिल फ़िल्मसीताकल्याणमका निर्माण किया।

सैरंध्रीभारत में बनी दूसरी रंगीन फ़िल्म थी लेकिन प्रिंटों को डेवलप किए जाने के दौरान रंगों के आपस में मिल जाने की वजह से ये कोशिश तकनीकी तौर पर असफल रही थी। उससे पहले साल 1932 में कोलकाता केमाडन थिएटरके बैनर में भी रंगीन फ़िल्मबिल्वमंगलका निर्माण किया जा चुका था। चूंकिबिल्वमंगलऔरसैरंध्रीका पोस्टप्रोडक्शन विदेश में किया गया था इसलिए इन दोनों फ़िल्मों पूरी तरह से भारतीय नहीं माना जाता। पहली भारतीय रंगीन फिल्मइम्पीरियल फ़िल्म कंपनीके बैनर में साल 1937 में बनीकिसान कन्याको माना जाता है जो पूरी तरह से भारत में ही बनी और डेवलप की गई थी।

1930 के दशक मेंअमृत मंथन’ (1934), ‘चन्द्रसेना, ‘धर्मात्मा’ (दोनों 1935), ‘राजपूत रमणी, ‘अमर ज्योति’ (दोनों 1936) औरदुनिया मानेऔरवहां’ (दोनों 1937) जैसी सफल और उद्देश्यपूर्ण फिल्मों का निर्माण करकेप्रभात फ़िल्म कंपनीअपने दौर की अग्रणी कंपनियों में जगह बना चुकी थी। हिंदी और मराठी में बनीअमृतमंथनको आज भी चन्द्रमोहन के, तोदुनिया माने’ (मराठी मेंकुंकु’) को शांता आप्टे के शानदार अभिनय के लिए याद किया जाता है। फ़िल्मदुनिया मानेमें शांता आप्टे का गाया अंग्रेज़ी गीतइन वर्ल्ड्स ब्रॉडफ़ील्ड ऑफ़ बैटलसंभवत: भारतीय सिनेमा में अपनी तरह का पहला प्रयोग था।चन्द्रसेनाका निर्माण हिंदी और मराठी के अलावा तमिल में भी किया गया था। लेकिन उसी दौरान कंपनी के पार्टनरों के बीच मतभेद उभरने लगे और साल 1937 में केशवराव धायबर नेप्रभातसे अलग होकरजयश्री सिनेटोनकी स्थापना कर ली।

धायबर के अलग हो जाने के बावजूदप्रभातके बैनर मेंगोपालकृष्ण’ (1938), ‘मेरा लड़का’ (मराठी – ‘माझा बाळ’ / 1938), ‘आदमी’ (मराठी – ‘माणुस’ / 1939), संत ज्ञानेश्वर (1940) औरपड़ोसी’ (मराठी – ‘शेजारी’ / 1941) जैसी स्तरीय और सफल फ़िल्में बनती रहीं। साल 1939 में धायबर की जगहप्रभातकी फ़िल्मों के वितरक बाबूराव पै बतौर पार्टनर गए थे। लेकिन सही मायनों में इस बैनर की फ़िल्मों के स्तर और सफलताओं के पीछे सबसे बड़ा हाथ वी.शांताराम जैसे उत्कृष्ट फ़िल्मकार का था।प्रभातके बैनर में साल 1932 से साल 1941 के बीच बनी कुल 16 टॉकी फ़िल्मों में से 11 का निर्देशन वी.शांताराम ने किया था।प्रभातकी फ़िल्मों के स्तर में तब गिरावट आनी शुरू हुई जब फ़िल्मपड़ोसीके निर्देशन के बाद वी.शांताराम ने भी इस संस्था को अलविदा कह दिया। साल 1942 में उन्होंने मुंबई के लालबाग के इलाक़े में स्थितवाडिया मूवीटोनका स्टूडियो किराए पर लेकरराजकमल कलामंदिरकी नींव रखी।

वी.शांताराम के अलग होने के बादप्रभातके बैनर मेंसंत-सखू (1941), ‘दस बजे’ (1942), ‘नयी कहानी’ (1943), ‘चांद, ‘रामशास्त्री’ (दोनों 1944), ‘लाखारानी’ (1945), ‘गोकुल, ‘हम एक हैं’ (दोनों 1946), ‘आगे बढ़ो, ‘सीधा रास्ता’ (दोनों 1947), ‘संत तुकाराम’ (1948), ‘अपराधीऔरसंत जनाबाई’ (दोनों 1949) जैसी फ़िल्में बनीं। साल 1948 में हिंदी में बनीसंत तुकारामइसी नाम से साल 1936 में मराठी में बनी फ़िल्म का रीमेक थी। लेकिन डी.डी.कश्यप द्वारा निर्देशितनयी कहानीऔर गजानन जागीरदार द्वारा निर्देशितरामशास्त्रीको छोड़कर अन्य कोई भी फ़िल्म ख़ास कमाल नहीं दिखा पायीं।

फ़िल्मचांदसे भारतीय सिनेमा के इतिहास की पहली संगीतकार जोड़ीहुस्नलाल-भगतरामऔर अभिनेत्री बेगमपारा ने करियर की शुरूआत की थी तो गुरूदत्त नेलाखारानी’ (1945) और देवआनंद नेहम एक हैं’ (1946) से हिंदी सिनेमा में कदम रखा था।हम एक हैंनिर्देशक प्यारेलाल संतोषी के करियर की भी पहली फ़िल्म थी। इसके अलावा गायिका-अभिनेत्री मंजु और उनके गायक-अभिनेता भाई बालकराम ने भीप्रभातकी फ़िल्मों से ही बतौर बालकलाकार अपना करियर शुरू किया था।

1940 के दशक में लगातार असफल होती फ़िल्मों की वजह सेप्रभात फ़िल्म कंपनीके हालात बिगड़ते चले गए और साल 1949 में बनी हिंदी-मराठी द्विभाषी फ़िल्मसंत जनाबाईअपने दौर के इस प्रतिष्ठित बैनर की आख़िरी फ़िल्म साबित हुई। साल 1952 मेंप्रभात स्टूडियोसमेत इस संस्था की तमाम संपत्ति को नीलाम कर दिया गया। साल 1929 से 1949 के बीच के दो दशकों में 6 साईलेंट, 29 हिंदी, 20 मराठी और 2 तमिल फ़िल्मों का निर्माण करने वाली संस्थाप्रभात फ़िल्म कंपनीअब भले ही इतिहास का हिस्सा बन चुकी हो लेकिनप्रभात स्टूडियोकी जगह पर खड़ाफ़िल्म एंड टेलिविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडियाआज भी भविष्य के फ़िल्मकारों को तराशने का काम पूरी शिद्दत के साथ कर रहा है।


(विशेष : फ़िल्म एंड टेलिविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडियाद्वाराप्रभात फ़िल्म कंपनीके समय की कुछ इमारतों और शूटिंग फ्लोर को आज भी उनके मूलरूप में सहेजकर रखा गया है| इन्हीं इमारतों में से एक में, तीन कमरों मेंप्रभात म्यूज़ियम स्थित है जिसमेंप्रभात की फिल्मों में इस्तेमाल किये गए कपड़े, तीर-तलवार-बख्तर-ढाल जैसे तमाम हथियार, मूर्तियां, वाद्य और मटके, सुराही, थाली, परात, गिलास जैसे घरेलू सामान के अलावाप्रभात के सभी भागीदारों, कलाकारों और फ़िल्मों की तस्वीरें और पोस्टर इत्यादि रखे गए हैं|


प्रभात स्टूडियो के पांचों भागीदारफ़िल्म एंड टेलिविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडियाके मुख्य गेट के सामने स्थितप्रभात लेन में बने बंगलों में रहते थे| इनमें से विष्णुपंत दामले, शेख फ़त्तेलाल और सीताराम बी.कुलकर्णी के बंगलों में आज उनकी तीसरी-चौथी पीढ़ियां रहती हैं, जबकि वी.शांताराम और केशवराव धायबर के बंगलों की जगह बहुमंज़िली इमारतें बन गयी हैं| इन सभी बंगलों और इमारतों के बाहर लगे बोर्ड पर सम्बंधित भागीदार का नाम, उनके जन्म और मृत्यु का वर्ष और इस स्थान पर उनके निवास के वर्षों का उल्लेख किया गया  है|)


We are thankful to

Mr. D.B. Samant, Mr. Harish Raghuvanshi & Mr. Harmandir Singh ‘Hamraz’ for their valuable suggestion, guidance and support.

Mr. Gajendra Khanna for the editing of English translation of the write up.

Mr. Manaswi Sharma for the technical support including video editing.


Neend Hamaari Khwaab Tumhare - Prabhat Film Company

                                       ...........Shishir Krishna Sharma

(First published in www.anmolfankaar.com founded by Mr.Gajendra Khanna, an integral part of the blog ‘Beete Hue Din’.)     

Among the ace film companies viz. ‘New Theatre’ & ‘Madan Theatre’ of Kolkata and ‘Ranjit Movietone’, ‘Bombay Talkies’ & ’Wadia Movietone’ of Mumbai during the 1930s,  another respectable name was of the ‘Prabhat Film Company’ of Pune which is still remembered for its contribution of more than 50 meaningful movies to the history of India Cinema. Not only the first Marathi talkie was produced by the ‘Prabhat Film Company’ but the first music composer duo of Hindi Cinema named ‘Husnlal Bhagatram’, director Pyarelal Santoshi and actors Dev Anand, Guru Dutt & Begumpara were also the products of the same company. First Indian movie to have won the ‘Best Movie Award’ in Venice Film Festival in the year 1937 titled ‘Sant Tukaram’ was also produced in Marathi under the banner of ‘Prabhat’.

Prabhat Film Company’ was founded by V.Shantaram and 4 of his companions named Vishnupant Damle, Sheikh Fattelal, Keshavrao Dhaibar and Sitaram B.Kulkarni. Shantaram, Damle, Fattelal and Dhaibar worked with the Kolhapur based ‘Maharashtra Film Company’ owned by renowned painter and filmmaker Baburao Painter in the era of silent films. They all resigned from ‘Maharashtra Film Company’ in the year 1929 and founded ‘Prabhat Film Company’ with financial help from Kolhapur’s ace businessman Sitaram B.Kulkarni who also joined them as a partner in the newly founded film company. A woman playing Trombone (Turahi / Tutari), an instrument which has a close relation with Maharashtrian culture was chosen as the logo of the organization.

 Gopal Krishna’ was the first movie made under this banner in the year 1929 which was directed by V. Shantaram and the actors were Suresh, Kamla Devi, Anant Apte, and Bajar Battoo. Later, 5 more silent movies viz. ‘Udaykal’, ‘Khooni Khanjar’, ‘Rani Sahiba’ (all 1930), ‘Zulm’ and ‘Chandrasdena’ (both 1931) were made under the banner of ‘Prabhat’.  ‘Udaykal’ and ‘Chandrasdena’ were directed by V.Shantaram, ‘Zulm’ by Keshav Rao Dhaibar whereas ‘Khooni Khanjar’ and ‘Rani Sahiba’ were directed by V.Shantaram-Dhaibar duo. V.Shantaram also acted in ‘Udaykal’.

The first talkie movie made under the banner of ‘Prabhat’ was a 1932 release ‘Ayodhya Ka Raja’. Apart from Hindi, this was simultaneously made in Marathi language with the title ‘Ayodhyecha Raja’ which was Marathi’s first talkie. This bilingual movie was directed by V.Shantaram with Pandit Gobind Rao Tembe as composer and Durga Khote, Master Vinayak, Gobind Rao Tembe, Babu Rao Pendharkar and Nimbalkar in the main roles. Actress Nanda is the daughter of the same Master Vinayak.

Originally founded in Kolhapur, ‘Prabhat’ was shifted to Pune in 1932. In the same year i.e. 1932, two more bilinguals ‘Jalti Nishani’ (‘Agni Kankan’ in Marathi) and ‘Maya Machhinder’ were made under the banner of ‘Prabhat’. This banner produced colour movie ‘Sairandhri’ and Tamil movie ‘Seetha Kalyanam’ in the year 1933. ‘Sairandhri’ was the 2nd colour movie made in India though this effort proved to be a technical failure due to the mixing of colours during the developing of the prints.

Earlier the ‘Madan Theatre’ at Kolkata had produced ‘Bilwa Mangal’ in the year 1932 which was the first colour movie ever made in India. Since both ‘Bilwa Mangal’ and ‘Sairandhri’s postproduction was done out of India, technically they are not considered as Indian movies in totality. The movie which is considered as the First Indian Colour Movie was ‘Kisan Kanya’ made under the banner of ‘Imperial Film Company’ in the year 1937 as this was shot, developed and completed in India only.

 Prabhat Film Company’ successfully produced movies with a social message like ‘Amrit Manthan’ (1934), ‘Chandrasena’, ‘Dharmatma’ (both 1935), ‘Rajpoot Ramani’, ‘Amar Jyoti’ (both 1936), ‘Duniya Na Mane’ and ‘Wahaan’ (both 1937) in the 1930s and made a place of its own among the leading companies of its time.

Hindi-Marathi bilingual ‘Amrit Manthan’ and ‘Duniya Na Mane’ (‘Kunku’ in Marathi) are still remembered for the respective magnificent performances by Chandramohan and Shanta Apte.  An English song ‘in the world’s broad field of battle’ sung by Shanta Apte in ‘Duniya Na Mane’ was probably the first ever experiment of its kind in Indian Cinema. ‘Chandrasena’ was a Hindi-Marathi-Tamil trilingual movie. But at the same time, differences started arising among partners which resulted into the parting of ways by Keshav Rao Dhaibar who eventually left ‘Prabhat’ in the year 1937 and founded ‘Jaishri Cinetone’.

Even after Dhaibar’s departure, production of successful and good movies like ‘Gopal Krishna’ (1938), ‘Mera Ladka’ (Marathi-‘Majha Baal’/1938), ‘Aadmi’ (Marathi-‘Manus’/1939), ‘Sant Gyaneshwar’ (1940) and ‘Padosi’ (Marathi-‘Shejari’/1941) continued under the banner of ‘Prabhat’. In the year 1939, distributor of ‘Prabhat’ movies Babu Rao Pai joined the company as partner in place of Dhaibar. But truly the main contribution behind the success and high level of movies made under this banner was that of excellent film maker V.Shantaram who directed 11 out of 16 talkies made under the banner of ‘Prabhat’ during 1932 and 1941. Deterioration of ‘Prabhat’ movies started after V.Shantaram bid adieu to this organization after the film ‘Padosi’. He got on rent Mumbai’s Lalbaug area based ‘Wadia Movietone’s studio and founded ‘Rajkamal Kalamandir’ there in 1942.

After V.Shantaram’s parting ways, movies ‘Sant Sakhu’ (1941), ‘Das Baje’ (1942), ‘Nai Kahani’ (1943), ‘Chaand’, ‘Ramshastri’ (both 1944), ‘Lakharani’ (1945), ‘Gokul’, ‘Hum Ek Hain’ (1946), ‘Aage Badho’, ‘Seedha Rasta’ (both 1947), ‘Sant Tukaram’ (1948), ‘Apradhi’ and ‘Sant Janabai’ (both 1949) were made under the banner of ‘Prabhat’. Made in Marathi in the year 1936 ‘Sant Tukaram’ was remade in Hindi in the year 1948.  But except D.D.Kashyap directed ‘Nai Kahani’ and Gajanan Jagirdar directed ‘Ram Shastri’, none of the movies could put an impression on the ticket window.

The first composer duo of Indian Cinema ‘Husnlal Bhagatram’ debuted from ‘Chaand’ (1944) and so did actress Begumpara. Gurudutt and Dev Anand started their acting career respectively with ‘Lakharani’ (1945) and ‘Hum Ek Hain (1946).  Director Pyarelal Santoshi also debuted with ‘Hum Ek Hain. Apart from this, actress-singer Manju and her actor-singer brother Balakram too started their careers as child artistes with ‘Prabhat’ movies.

Prabhat Film Company’s circumstances uncontrollably deteriorated due to the continuous failure of its movies made in the 1940s and the 1949 release Hindi-Marathi bilingual ‘Sant Janabai’ proved to be the last production of this respectable banner. In the year 1952, all the properties of this organization including the ‘Prabhat Studio’ were auctioned. ‘Prabhat Film Company’ produced 6 Silent, 29 Hindi, 20 Marathi and 2 Tamil movies in the 2 decades between 1929 and 1949. Though the ace banner of its time has now become history, ‘The Film & Television Institute of India’ (FTII) standing in place of ‘Prabhat Studio’ is doing an amazing job of carving the careers of ‘would be’ film makers today.

(Special Note : ‘Film and television institute of India’ has preserved some of the buildings and shooting floors from the times of ‘Prabhat Film Company’ in their original state to this day. Situated in 3 rooms of one such building is ‘Prabhat Museum’, which is home to clothes, weapons like arrows, swords, armors and shields, statues, musical instruments, domestic appliances such as pots, jugs, plates, platters and glasses, all used in Prabhat movies. Along with this it also has photographs and posters of all his partners, actors and movies on display.

All five partners of ‘Prabhat Film Company’ used to stay in the bungalows located in ‘Prabhat lane’ which is situated right opposite ‘Film and television institute of India’. Out of these, 3rd and 4th generations of Vishnupant Damle, Shaikh Fattelaal and Sitaram B Kulkarni stay in those bungalows to this day whereas V. Shantaram and Keshavrav Dhaibar’s bungalows have been replaced by multistory buildings. Their names, year of birth, year of death and a summary of the time they spent in these bungalows is mentioned on the boards outside their respective bungalows/ buildings.)