Friday, February 9, 2024

"Aa Ke Dard Jawan Hai, Sajna, Raat Ka Ishara Hai" - Ahmed Wasi

 

आ के दर्द जवां है, सजना हाए, रात का इशारा है” – अहमद वसी 

                                                               …..शिशिर कृष्ण शर्मा

अहमद वसी! वो इकलौते गीतकार, जिन्हें संगीतकार ओ.पी.नैयर ने ब्रेक दिया था| लेकिन इस तथ्य की ओर मुझ जैसे नैयर साहब के घोर प्रशंसकों का भी शायद कभी ध्यान नहीं गया| दरअसल नैयर साहब ने अपनी कुल 78 फ़िल्मों में जितने भी गीतकारों के साथ काम किया वो सभी पहले से फिल्मों में लिखते आ रहे थे| अपवाद थे तो अहमद वसी, जिन्होंने नैयर साहब की साल 1973 की म्यूज़िकल हिट फ़िल्म 'प्राण जाये पर वचन न जाए' के कुल छः में से एक गीत 'आ के दर्द जवां है, सजना हाए, रात का इशारा है' लिखकर फ़िल्मों में कदम रखा था|

अहमद वसी जी का जन्म 8 अक्टूबर 1943 को सीतापुर - उत्तरप्रदेश के मौहल्ला कज़ियारा के एक प्रतिष्ठित शिया परिवार में हुआ था| उनके पूर्वज मूल रूप से ईरान के रहने वाले थे, जिन्होंने भारत आकर शुरूआत में बाराबंकी के सैदपुर में डेरा डाला और फिर सीतापुर चले आये|  चूंकि वो काज़ी थे इसलिए सीतापुर आकर जिस जगह को उन्होंने आबाद किया, वो जगह मौहल्ला कज़ियारा कहलायी| मौहल्ला कज़ियारा का अहमद वसी जी का पुश्तैनी घर बड़े इमामबाड़ा के सामने है और घर के ठीक पीछे ख़ानदान के उन्हीं पूर्वज की क़ब्र| अहमद वसी जी कहते हैं, "आज भी जब हमारे परिवारों में शादी-ब्याह जैसा कोई शुभ काम होता है तो सबसे पहले उस क़ब्र पर गुलगुले चढ़ाकर और शमां जलाकर उन बुज़ुर्ग का आशीर्वाद मांगा जाता है|”

अहमद वसी जी का पूरा नाम सैयद अहमद वसी रिज़वी है| उनकी स्कूली पढ़ाई सीतापुर के गवर्नमेंट हाई स्कूल से हुई, जिसमें जोश मलीहाबादी भी पढ़े थे| और फिर उन्होंने राजा इंटरमीडिएट कॉलेज से 11वीं-12वीं करने के बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी से बी.ए. एल.एल.बी. किया|

अहमद वसी जी के पिता मोहम्मद अतहर महमूदाबाद रियासत के मैनेजर थे, पढ़ने-लिखने का शौक़ रखते थे और एक बेहतरीन शायर भी थे| वो बचपन में ही घरवालों के साथ कर्बला की ज़ियारत कर आये थे और अदब की दुनिया में 'ज़ायर सीतापुरी' के नाम से जाने जाते थे| ज़ायर शब्द उन्होंने 'ज़ियारत' से लिया था| मोहम्मद अतहर अपनी धार्मिक शायरी के लिए मशहूर थे और उन्होंने जदीद अर्थात नये मर्सिये का चलन शुरू किया था| पुराना मूल मर्सिया जहां कर्बला के ग़म को, मातम और आंसुओं को लेकर लिखा जाता था, वहीं जदीद मर्सिया में कर्बला से सामाजिक समस्याओं को भी जोड़ा गया था| कहा जाता है कि जदीद मर्सिये की बुनियाद जोश मलीहाबादी ने रखी थी|

3 बहनों और 5 भाईयों में अहमद वसी सबसे बड़े थे| दुर्भाग्य से उनके सभी बहन भाई अब इस दुनिया से जा चुके हैं, जिसका ग़म और दर्द बड़े भाई की बातों में छलक ही जाता है| 

Shahid Raza
अहमद वसी साहब की अम्मी क़मर बानो संडीला-हरदोई की थीं| नाना पुलिस की नौकरी में थे, वो ट्रांसफ़र पर सीतापुर आए तो वहीं उन्होंने बेटी की शादी भी कर दी थी| अहमद वसी साहब के चाचा नादिम सीतापुरी भी एक नामी शायर थे| उन्होंने इंक़लाब जैसे कई बड़े अखबारों में काम किया और लगातार छपते भी रहे| अहमद वसी पर चाचा का बहुत प्रभाव था| चाचा को देख और पढ़पढ़कर अहमद वसी ने भी स्कूल के ज़माने से ही लिखना शुरू कर दिया था| 

अहमद वसी कहते हैं, "मुहर्रम की मजलिसों में पढ़ने को कहा जाता था, तो मेरी कोशिश रहती थी कि मैं अपना ही लिखा हुआ पढूं| मैं हाथ का लिखा पर्चा 'फूल' निकालता था, जिसे ख़ानदान में सभी लोग पढ़ते थे| उधर सीतापुर में मैं रंगमंच से भी जुड़ गया था| मैं नाटक लिखता था, डायरेक्ट करता था इस इस मुहिम में मेरा साथ देते थे मेरे दोस्त और सीतापुर के जुनूनी रंगकर्मी शाहिद रज़ा, जो स्टेज बनाने से लेकर मेरे साथ कुर्सियां-दरियां उठाने तक का काम पूरे जोशोखरोश से करते थे| शाहिद रज़ा एक बेहतरीन कॉमेडियन थे, जिनके मंच पर आते ही दर्शक ठहाके लगाने लगते थे| शाहिद रज़ा अब दिल्ली में रहते हैं और ईरान कल्चरल हाउस से जुड़े हुए हैं|” 

अहमद वसी लगातार लिख रहे थे| उनकी रचनाएं पकिस्तान की पत्रिकाओं में भी छपने लगी थीं| लखनऊ रेडियो पर उनके लिखे नाटक प्रसारित हो रहे थे| लखनऊ शहर और यूनिवर्सिटी में उनका नाम हो गया| 24 - 25 साल की उम्र में उनकी ख़ासी पहचान बन गयी थी| और इसी वजह से उनकी मुहब्बत भी परवान चढ़ी| 

अहमद वसी कहते हैं, "वो काफ़ी पढ़ीलिखी थीं और टीचर थीं| आगे चलकर एक इंटर कॉलेज की प्रिंसिपल बनीं| लेकिन शादी के लिए उनके मां-बाप तैयार नहीं हुए क्योंकि मेरे पास नौकरी नहीं थी| इस झटके और ग़म ने भी मेरी शायरी को काफ़ी निखारा| मुझे बचपन से ही गाने सुनने का बहुत शौक़ था| ननिहाल में भोंपूवाला ग्रामोफोन था, जिसपर बजने वाले लाख के रिकार्ड्स मुझे बहुत आकर्षित करते थे| बड़ा हुआ तो ये शौक़ और भी ज़ोर पकड़ता चला गया| लखनऊ में कॉलेज के दौरान होटलों में ज्यूकबॉक्स में पैसे डाल-डालकर रिकार्ड्स पर गाने सुनता था|”

लखनऊ में सीतापुर के रहने वाले अहमद वसी के हमउम्र और छोटेबड़े तमाम लोगों का एक ग्रुप बन गया था| वो सब साथ में सिनेमा देखने जाते थे| एक रोज़ वो फ़िल्म 'नया दौर' देखने गए, जिसमें अहमद वसी जी के पसंदीदा दिलीप कुमार, साहिर और ओ.पी.नैयर की तिगडी पहली बार एक साथ काम कर रही थी| अहमद वसी कहते हैं, "फ़िल्म शुरू हुई| टाइटल्स में साहिर का नाम आया तो मेरे मुंह से बेसाख्ता निकल पड़ा, 'एक रोज़ मेरा नाम भी इसी तरह स्क्रीन पर आएगा!’ ये सुनकर सभी साथी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगे| फ़िल्म देखकर वापस लौटे तो साथियों ने कहा, ‘बहुत उड़ने लगे हो| छपना अलग बात है, लेकिन फ़िल्मों के लिए लिखना?’ मैंने जवाब दिया, ‘एक रोज़ लिख के दिखा दूंगा| ज़्यादा बोलोगे तो ओ.पी.नैयर के साथ भी लिख के दिखा दूंगा| जो हारे, वो जीतने वाले को बस पिक्चर दिखा दे, वो भी नया दौर|”


उन्हीं दिनों, साल 1966 में अचानक ही अहमद वसी जी के पिता का निधन हो गया| उधर माशूका की भी शादी हो गयी| अहमद वसी कहते हैं, "मैं घर में बड़ा| ऊपर से बेकारी| लखनऊ काटने को दौड़ता सा महसूस होने लगा|

‘लखनऊ जो मेरा शहर-ए-आरज़ू था, वीराना लगने लगा| दिल ने कहा, यहां से कहीं और चल|’ 

सोचा बंबई चलो, जहां मेरे एक चाचा रहते थे|” 

अहमद वसी 'ऑल इण्डिया रेडियो' लखनऊ जाकर ड्रामा प्रोड्यूसर कुमुद नागर से मिले| कुमुद जी सुप्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार अमृतलाल नागर के बेटे और फ़िल्म लेखिका अचला नागर के भाई थे| अहमद वसी कहते हैं "नागर जी ने कहा, मुम्बई में मेरे उस्ताद मुख्तार अहमद जी हैं जो विविध भारती में हवामहल पेश करते हैं| उनसे मिलना, मेरा नाम ही काफ़ी है|” 

साल 1967 के फ़रवरी माह में अहमद वसी मुम्बई पहुंचे| उनके चाचा कुर्ला में रहते थे और किताबों के कारोबारी थे| अहमद वसी ने उनके यहां डेरा डाला| फिर वो विविध भारती पहुंचे| मुख्तार अहमद जी से मिले तो उन्होंने उसी दिन हवा महल लिखने को दे दिया| अहमद वसी ने ड्रामा 'ख़ाली मकान' लिखा| उनकी मुलाक़ात 'ऑल इण्डिया रेडियो' की उर्दू सर्विस के मुमताज़ बसीर साहब से हुई, जो लखनऊ के रहने वाले थे| उनसे जानपहचान हो गयी| 

अहमद वसी कहते हैं, "एक रोज़ मुमताज़ बसीर साहब ने मुझे अपने ऑफ़िस में बुलाकर कहा कि विविध भारती में प्रोग्राम कॉम्पियर की जगह निकलने वाली है, एप्लाई कर दो, लेकिन मेरा नाम नहीं आना चाहिए| मैंने एप्लाई किया| अब तक मेरा जो कुछ छपा था, इंटरव्यू में मैं उसकी कटिंग्स का पुलिंदा और तमाम सर्टिफिकेट्स लेकर पहुंचा| स्टेशन डायरेक्टर दीक्षित जी के असिस्टेंट रोशनअली मूलजी मुझे पढ़ते आये थे| उन्होंने दीक्षित जी को मेरा लिखा पढ़कर सुनाया, जिसमें हवा महल का मेरा ड्रामा भी शामिल था| और इस तरह मुझे नौकरी के लिए चुन लिया गया|” 

अहमद वसी जी ने अक्टूबर 1967 में विविध भारती की नौकरी ज्वाइन की थी| उनका काम रेडियो कार्यक्रमों की स्क्रिप्ट लिखना था| आगे चलकर वो अनाऊंसर की ज़िम्मेदारी भी संभालने लगे| विविध भारती के वरिष्ठ अनाऊंसर शील वर्मा आशा भोंसले के मुंहबोले भाई थे और ओ.पी.नैयर से भी उनकी गहरी दोस्ती थी| एक रोज़ शील वर्मा के ज़रिये अहमद वसी जी ओ.पी.नैयर के संपर्क में आये और फिर उनका मिलना-जुलना होने लगा| 

अहमद वसी बताते हैं, “नैयर साहब अक्सर शाम के समय मुझे और आशा भोंसले को साथ लेकर गाड़ी में घूमने निकल जाते थे| रात का खाना भी मैं उन्हीं के साथ बाहर ही खाता था| एक रोज़ मैंने उन्हें लखनऊ का वो क़िस्सा सुनाया जब फिल्म 'नया दौर' के टाइटल्स देखकर मेरे मुंह से निकल पड़ा था कि 'एक रोज़ मेरा नाम भी इसी तरह स्क्रीन पर आएगा!’ और ‘ज़्यादा बोलोगे तो ओ.पी.नैयर के साथ भी लिख के दिखा दूंगा| ये सुनकर नैयर साहब हंसने लगे, और फिर ख़ामोश हो गए| बहरहाल हमारा मिलना-जुलना बदस्तूर जारी रहा|” 

5-7 महीने बाद एक रोज़ अहमद वसी जी को नैयर साहब ने फ़ोन करके शारदा बिल्डिंग, ए-रोड, चर्चगेट के अपने घर पर आने को कहा| अहमद वसी नैयर साहब से मिलने पहुंचे| नैयर साहब ने उनसे कहा कि मैंने एक तस्वीर साईन की है| तुम्हें ट्रायल के लिए एक गीत दूंगा, जिसका पहला लफ्ज़ 'आ' होना चाहिए| सिंगर का मुंह खुलना चाहिए|  

(नैयर साहब फ़िल्म या पिक्चर के बजाय तस्वीर शब्द का इस्तेमाल करते थे, और ये मेरा अर्थात शिशिर कृष्ण शर्मा का भी निजी अनुभव है)|

अहमद वसी बताते हैं, “मैंने रात भर जागकर 96 मुखड़े लिखे| अगले दिन तमाम मुखड़े लेकर नैयर साहब के पास गया तो वो कन्फ्यूज़ हो गए| उन्होंने मुझे फ़िल्म के निर्देशक और जानेमाने लेखक अली रज़ा साहब के पास भेज दिया| अली रज़ा साहब ने कहा कि मुखड़े फाइनल करना तो संगीतकार का काम है| लेकिन मेरे ये कहने पर कि नैयर साहब ने ही मुझे आपके पास भेजा है, अली रज़ा साहब ने दो-तीन मुखड़े चुन लिए| बातचीत के दौरान उन्होंने मुझसे मेरे घर और ख़ानदान के बारे में पूछा तो पता चला वो मेरे चाचा हैदर असद के दोस्त थे और दोनों लखनऊ के 'शिया कॉलेज' में साथ पढ़ते थे| बहरहाल नैयर साहब ने उन दो तीन मुखड़ों में से 'आ के दर्द जवां है' को चुना| उस फ़िल्म, यानी 'प्राण जाये पर वचन न जाये' का मुहूर्त आशा भोंसले के गाये इसी गीत से हुआ था, जिसका क्लैप अली रज़ा साहब की पत्नी, अभिनेत्री निम्मी ने दिया था|”

अहमद वसी का ये पहला ही गीत सुपरडुपर हिट हुआ| उसी साल यानी 1973 की ही फ़िल्म 'टैक्सी ड्राईवर' में भी ओ.पी.नैयर ने अहमद वसी को एक गीत लिखने को दिया| आशा भोंसले का ही गाया वो गीत 'बालम हरजाई, जा मैं तो आंख मिला पछतायी' भी हिट हुआ था| और फिर आयी साल 1978 की 'हीरामोती'| नैयर साहब ने इस  फ़िल्म के सभी 6 गीत लिखने की ज़िम्मेदारी अहमद वसी जी को दी| इस फ़िल्म के सभी गीत हिट हुए थे, जिनमें मोहम्मद रफ़ी और दिलराज कौर के गाये डुएट 'होंठ हैं तेरे दो लाल हीरे, इन्हें खोलना तू धीरे धीरे' को आम लोगों ने ख़ासतौर से पसंद किया था| अहमद वसी के अनुसार इस फ़िल्म में मोहम्मद रफ़ी, मन्नाडे और दिलराज कौर की गायी, ‘ज़िंदगी लेकर हथेली पर दीवाने आ गए, तीर खाने के लिए बनकर निशाने आ गए' ओ.पी.नैयर द्वारा अपने पूरे करियर में संगीतबद्ध की गयी एकमात्र क़व्वाली थी|  

इसके बाद नैयर साहब के पास लगभग 12 सालों तक काम नहीं रहा| और फिर 1990 के दशक की शुरूआत में उन्हें एक साथ 3 फ़िल्में मिलीं, ‘जानम तेरे लिए', ‘निश्चय' और 'ज़िद'| ‘जानम तेरे लिए' के लिए अहमद वसी ने दो गीत लिखे| अनुराधा पोडवाल का गाया सोलो ‘मैं मिलूंगी तुझको राधा कभी मीरा बनकर' और अनुराधा पोडवाल और शब्बीर कुमार का गाया टाइटल सांग ‘कुरता सिलाया रंगदार, ओ जानम तेरे लिए'| बाद में इस फ़िल्म का टाइटल 'जानम तेरे लिए' से बदलकर 'दिल तेरे हवाले' कर दिया गया था, लेकिन ये फ़िल्म बन ही नहीं पायी|  फिल्म के लिए रिकॉर्ड किये गए 7 गीत भी रिलीज़ नहीं हुए|

(विशेष टिप्पणी:- इस फ़िल्म के साथ महत्वपूर्ण रूप से जुड़े एक मित्र ने रिकॉर्डिंग के दौरान ये सातों दुर्लभ गीत अपने लिए एक ऑडियो कैसेट में ट्रांसफ़र कर लिये थे| उन्होंने मेरे नैयर प्रेम को देखते हुए वो सभी गीत मुझे भी दिए| आज ये गीत मेरे संग्रह का एक अहम हिस्सा हैं|)

साल 1981 की फ़िल्म 'क़ानून और मुजरिम' में अहमद वसी का लिखा एक गीत आज भी अक्सर बजता और बेहद चाव से सुना जाता है| और वो है, सी.अर्जुन के संगीत में सुरेश वाडकर और उषा मंगेशकर का गाया डुएट 'शाम रंगीन हुई है तेरे आंचल की तरह, सुरमई रंग सजा है तेरे काजल की तरह’| 

साल 1987 की फ़िल्म 'वली-ए-आज़म' में अहमद वसी जी का लिखा और चित्रगुप्त के संगीत में तलत महमूद और हेमलता का गाया 'मेरे शरीक़े सफ़र अब तेरा ख़ुदा हाफ़िज़' भी अपने दौर का एक हिट गीत था| ये गीत इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि तलत महमूद का गाया और रिकॉर्ड कराया गया ये आख़िरी गीत है|

Lekh Tondon

अहमद वसी जी की अब तक की आख़िरी फ़िल्म साल 2019 की 'फिर उसी मोड़ पर' है| इस फ़िल्म के निर्माता और संगीतकार त्रिनेत्र वाजपेयी और निर्देशक लेख टंडन थे| 'प्रोफ़ेसर', 'आम्रपाली', 'झुक गया आसमान', 'प्रिंस' और 'दुल्हन वोही जो पिया मन भाये' जैसी फ़िल्मों के निर्देशक लेख टंडन साहब की भी ये आख़िरी फ़िल्म थी, जो उनके निधन के दो साल बाद रिलीज़ हुई थी|

अहमद वसी विविध भारती की नौकरी से साल 2003 में रिटायर हुए थे| उनके परिवार में पत्नी और दो विवाहित बेटे हैं| बड़े बेटे वसी हुसैन ज़ायर उर्फ़ पैकर मुम्बई विश्वविद्यालय से एम.कॉम.,एम.लिब. करने के बाद अब सीतापुर के रिजेंसी डिग्री कॉलेज में लाइब्रेरियन के पद पर कार्यरत हैं| छोटे बेटे वसी अकील ज़ायर उर्फ़ नैयर सी.ए. हैं और मस्कट में रहते हैं| बड़े बेटे से अहमद वसी जी की की दो पोतियां हैं और छोटे से एक पोती और एक पोता|

Wasi Family

अहमद वसी जी ने बच्चों के लिए भी बहुत कुछ लिखा|  वो बताते हैं, "दिल्लीप्रेस की बालपत्रिका 'खिलौना' में साल 1962 से मैं लगातार छपता रहा| 1960 के दशक में दुनिया के पहले अंतरिक्षयात्री, रूस के यूरी गगारिन  लखनऊ आए तो बच्चों और हम छात्रों को उनके स्वागत के लिए अमौसी हवाईअड्डे पर ले जाया गया, जहां मेरी नज़्म 'हम चन्दा देस में जाएंगे' फ़्रेम कराकर उन्हें भेंट की गयी थी|“

अहमद वसी का लेखन आज भी उसी ऊर्जा के साथ जारी है| उनकी शायरी और ग़ज़लों-नज़्मों की अभी तक 10 से ज़्यादा किताबें छप चुकी हैं| साल 2023 में उनका किसान पर काव्य में लिखा ड्रामा 'धरती के लाल' और ग़ज़लों-नज़्मों की किताब 'काग़ज़ नम रहा' बाज़ार में आयी और सराही गयी| मुम्बई विश्वविद्यालय से उन पर एक छात्र मोहम्मद मेराज़ ने एम.फ़िल. किया| 

हिन्दी ग़ज़लों की अहमद वसी की किताब 'बादलों के शहर' का जया रॉयचौधरी द्वारा अंग्रेज़ी में अनुवाद किया गया, तो उनकी चुनींदा ग़ज़लों का मनीषा पटवर्धन द्वारा किया गया मराठी अनुवाद, किताब के रूप में बाज़ार में आया| उधर अहमद वसी जी के चुनींदा शेरों और ग़ज़लों के शबनम गोरखपुरी द्वारा किये गये अंग्रेज़ी अनुवाद की भी एक किताब हाल ही में प्रकाशित हुई है|


We are thankful to –

Mr. Harish Raghuvanshi (Surat) & Mr. Harmandir Singh ‘Hamraz’ (Kanpur) for their valuable suggestion, guidance, and support.

Dr. Ravinder Kumar (NOIDA) for the English translation of the write up.

Mr. S.M.M.Ausaja (Mumbai) for providing movies’ posters.

Mr. Manaswi Sharma (Zurich-Switzerland) for the technical support. 


Ahmed Wasi On BHD



                 

                                   

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