Thursday, January 31, 2013

“Jeevan Ki Veena Ka Taar Bole”- Nirupa Roy

जीवन की वीणा का तार बोले- निरूपा रॉय     

                ............शिशिर कृष्ण शर्मा

हिंदी सिनेमा में मां का ज़िक़्र होते ही जो पहला चेहरा ज़हन में उभरता है, वो है निरूपा रॉय का। 1970 और 1980 के दशक के दर्शकों के ज़हन में निरूपा रॉय की छवि भले ही उस दौर की फ़िल्मी मां की हो लेकिन हिंदी सिनेमा के सुनहरी दौर के दर्शक इस बात से वाक़िफ़ हैं कि इस अभिनेत्री ने अपने करियर की शुरूआत बतौर हिरोईन की थी और वो अपने दौर की कामयाब हिरोईनों में गिनी जाती थीं। यही नहीं, जीवन की वीणा का तार बोले, ‘ लौट के आजा मेरे मीत’, ‘ज़रा सामने तो आओ छलिए’, ‘मेरा छोटा सा देखो ये संसार’, ‘चाहे पास हो चाहे दूर हो’, ‘ढलती जाए रात’, क्यों मिले तुम हमऔरमैं यहां तू कहां, मेरा दिल तुझे पुकारेजैसे ज़बर्दस्त हिट गीत भी निरूपा रॉय पर ही फ़िल्माए गए थे।

निरूपा रॉय से मेरी मुलाक़ात दक्षिण मुंबई के नेपियनसी रोड स्थित एम्बेसी अपार्टमेंट के उनके घर पर हुई थी। ग्राऊंड फ़्लोर के 3 फ़्लैट्स से मिलकर बना उनका बड़ा सा घर, उसके पीछे अरब सागर के किनारे बहुत बड़ा लॉन, लॉन में हर तरफ़ सजी संगमरमर की बेहद ख़ूबसूरत मूर्तियां, बातचीत में कब 4 घंटे गुज़र गए, पता ही नहीं चला।  निरूपा रॉय का जन्म 4 जनवरी 1931 को गुजरात के वलसाड शहर में एक परंपरावादी गुजरातीचौहानपरिवार में हुआ था। पिता रेलवे में नौकरी करते थे और परिवार में माता-पिता के अलावा निरूपा रॉय और उनकी एक बहन थी। निरूपा रॉय का असली नाम कांता था लेकिन माता-पिता उन्हें प्यार सेछिबीकहते थे। स्कूली पढ़ाई के दौरान साल 1945 में, महज़ 14 साल की उम्र में उनकी शादी हुई और वो कांता चौहान से श्रीमती कोकिला बलसारा बनकर मुंबई चली आयीं। उनके पति कमल बलसारा राशनिंग इंस्पेक्टर की नौकरी पर थे लेकिन एक्टिंग का उन्हें बेहद शौक़ था जो पूरा नहीं हो पा रहा था।

निरूपा रॉय के मुताबिक़, उनकी शादी हुए 3-4 महिने ही बीते होंगे कि उनके पति की नज़रसनराईज़ पिक्चर्सके, गुजराती फ़िल्मराणकदेवीके लिए नए चेहरों की तलाश से संबंधित एक विज्ञापन पर पड़ी, जिसके लिए उन्होंने आवेदन कर दिया। इंटरव्यू के लिए बुलावा आया तो निरूपा रॉय भी पति के साथ गयीं। पति तो एक बार फिर से इंटरव्यू में नाकाम रहे लेकिन निरूपा रॉय के सामने बिना इंटरव्यू के ही फ़िल्म की नायिका की भूमिका का प्रस्ताव रख दिया गया। पति के ज़ोर देने पर उन्हें उस प्रस्ताव के लिए हामी भरनी पड़ी, हालांकि बाद में उन्हें नायिका की जगह एक छोटी भूमिका दी गयी।  उन्हेंकोकिला बलसाराकी जगह फ़िल्मी नामनिरूपा रॉयभीसनराईज़ पिक्चर्सके मालिक वी.एम.व्यास ने ही दिया था। आगे चलकर उनके पति ने भीबलसाराकी जगहरॉयउपनाम अपना लिया।  फ़िल्मराणकदेवीसाल 1946 में प्रदर्शित हुई थी।

उस ज़माने में अच्छे परिवार के लोगों और ख़ासतौर से लड़कियों-महिलाओं का फ़िल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। निरूपा रॉय के फ़िल्म में काम करने की ख़बर मिलते ही परिवार और समाज में हंगामा खड़ा हो गया। उनके पिता ने धमकी दे डाली कि अगर उनकी बेटी ने फ़िल्म में काम किया तो मायके से उसके रिश्ते हमेशा के लिए टूट जाएंगे। निरूपा रॉय का कहना था, “समाज का विरोध तो फ़िल्म राणकदेवी के प्रदर्शित होते ही ठंडा पड़ गया, लेकिन पिताजी अपनी बात पर अड़े रहे। उन्होंने वाकई आख़िरी सांस तक मेरा मुंह नहीं देखा। यहां तक कि उनके ज़िंदा रहते मां से भी मैं छुपछुपकर ही मिलती थी

निरूपा रॉय की साईन की हुई पहली हिंदी फ़िल्मअजीत पिक्चर्सके बैनर में साल 1948 में बनीगुणसुंदरीथी। हिंदी और गुजराती में बनी इस द्विभाषी फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक रतिभाई पुणातर थे। तीन संगीतकारों, बुलो सी.रानी, हंसराज बहल और अविनाश व्यास के संगीत से सजी इस फ़िल्म में निरूपा रॉय के नायक मनहर देसाई थे। लेकिन उनकी पहली प्रदर्शित हिंदी फ़िल्म सरदार चंदूलाल शाह की कंपनीरणजीत मूवीटोनकीलाखों में एक(1947) थी जो उन्होंनेगुणसुंदरीके बाद साईन की थी। तैमूर बैरमशाह द्वारा निर्देशित और हंसराज बहल और बुलो सी.रानी द्वारा संगीतबद्ध इस फ़िल्म में निरूपा रॉय के नायक पाकिस्तानी कलाकारकमलथे। सरदार चंदूलाल रतिभाई पुणातर के मामा थे।

निरूपा रॉय का कहना था, “उस जमाने में धार्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक फ़िल्मों के अपने-अपने कलाकार हुआ करते थे लेकिन मैं सभी तरह की फ़िल्मों में समान रूप से व्यस्त हो गयी थी। हर हर महादेव (1950), शिवशक्ति (1952), नागपंचमी (1953), शिवकन्या (1954), सती मदालसा (1955), सती नागकन्या (1956) और चण्डीपूजा (1957) जैसी क़रीब 50 धार्मिक फ़िल्मों में मैंने महीपाल, मनहर देसाई, साहू मोदक और त्रिलोक कपूर जैसे नायकों के साथ काम किया और सीता, सावित्री, दमयंती जैसे सभी पौराणिक चरित्र निभाए। अमरसिंह राठौर (1957), सम्राट चन्द्रगुप्त (1958), कवि कालिदास (1959), रानी रूपमति (1959), वीर दुर्गादास (1960) और रज़िया सुल्तान (1961) जैसी क़रीब 10 ऐतिहासिक फ़िल्में बतौर नायिका मैंने जयराज और भारतभूषण के साथ कीं

निरूपा रॉय को हमारी मंज़िल (1949), मन का मीत (1950), भाग्यवान (1953), धर्मपत्नी (1953), दो बीघा ज़मीन (1953), गरम कोट (1955), कंगन (1959), हीरामोती (1959), बेदर्द ज़माना क्या जाने (1959) और घर की लाज (1960) जैसी सामाजिक फ़िल्मों में भी काफ़ी पसंद किया गया। बतौर नायिका उनकी ज़्यादातर फ़िल्में 1950 के दशक में बनीं। साल 1956 में प्रदर्शित हुई फ़िल्मभाई-भाईमें वो पहली बार चरित्र भूमिका में नज़र आयीं। इस फ़िल्म में उन्होंने अशोक कुमार की पत्नी की भूमिका निभाई थी और अशोक कुमार और किशोर कुमार ने भी इसी फ़िल्म में पहली बार एकसाथ अभिनय किया था।

निरूपा रॉय के मुताबिक़, “साल 1955 में बनी फ़िल्म मुनीमजी में नायिका की जवानी से लेकर बुढ़ापे तक की भूमिका को मैंने एक चुनौती मानकर स्वीकार किया था। मैं उस फ़िल्म की पूरी शूटिंग भी कर चुकी थी लेकिन मुझे पता ही नहीं चला कि कब जवानी के मेरे सभी सीन काटकर मेरी जगह नलिनी जयवंत को ले लिया गया। इस धोखाधड़ी से मुझे ऐसा धक्का पहुंचा कि उस फ़िल्म के लिए मिलासर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्रीकाफ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारभी मेरे दुख को कम नहीं कर पाया था। उधर मैंने एकाध बार सिंदबाद सेलर (1952) और बाज़ीगर (1959) जैसी स्टंट फ़िल्मों के ज़रिए धार्मिक और ऐतिहासिक फ़िल्मों की अपनी इमेज को बदलने की कोशिश भी की लेकिनदेवीका मारधाड़ करना दर्शकों को ज़रा भी पसंद नहीं आया। विरोधस्वरूप मुझे इतने पत्र मिले कि भविष्य में स्टंट फ़िल्में करने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई


1960 का दशक शुरू होते-होते निरूपा रॉय पूरी तरह से चरित्र अभिनेत्री बन चुकी थीं। फ़िल्म छाया (1961) और शहनाई (1964) के लिए भी उन्होंने सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्रीके फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार हासिल किए। चांद और सूरज (1965), आया सावन झूम के (1969), आन मिलो सजना (1970) और छोटी बहू (1971) जैसी कई फ़िल्मों में उन्होंने मां की भूमिका की।

लेकिन साल 1975 में बनी हिट फ़िल्म दीवार में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की मां की भूमिका ने उन्हें पूरी तरह सेफ़िल्मी मांके तौर पर स्थापित कर दिया। निरूपा रॉय के मुताबिक़, “मैंने मां (1976), अमर अकबर एंथोनी (1977), मुक़द्दर का सिकंदर (1978), सुहाग (1979), गौतम गोविंदा (1979), कर्तव्य (1979), गंगा मेरी मां (1982), गंगा जमुना सरस्वती (1988), गंगा तेरे देश में (1988) जैसी कई फ़िल्मों में उस दौर के सभी बड़े नायकों की मां की भूमिका की, हालांकि मुझे ख़ासतौर पर अमिताभ बच्चन की फ़िल्मी मां के तौर पर पहचाना जाता रहा 1980 के दशक के मध्य तक मैं अभिनय में काफ़ी व्यस्त रही। फिर धीरे-धीरे काम कम होता चला गया। साल 1999 में बनीं लाल बादशाह, लव यू हमेशा और जहां तुम ले चलो मेरी आख़िरी प्रदर्शित फ़िल्में हैं। जहां तुम ले चलो में मैंने जिम्मी शेरगिल की दादी की भूमिका की थी

साल 2004 में निरूपा रॉय कोफ़िल्मफ़ेयर-लाईफ़टाईम अचीवमेंट अवार्डसे सम्मानित किया गया था। क़रीब 55 साल के अपने करियर के दौरान उन्होंने क़रीब 300 हिंदी फ़िल्मों के अलावा 16 गुजराती फ़िल्मों में भी अभिनय किया। उनके परिवार में पति कमल रॉय, दो बेटे योगेश और किरण और एक पोता, एक पोती शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने अपनी ननद की बेटी रेखा को बचपन से अपनी बेटी की तरह पाला और उसकी शादी की। रेखा परमार अपने पति के साथ लंदन में रहती हैं।

निरूपा रॉय का निधन दिनांक 13 अक्टूबर 2004 को 73 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से हुआ।        


We are thankful to –

Mr. Harish Raghuvanshi & Mr. Harmandir Singh ‘Hamraz’ for their valuable suggestion, guidance, and support.

Mr. S.M.M.Ausaja for providing movies’ posters.

Mr. Sanjeev Tanwar for providing the rare picture of V.M.Vyas. 

Ms. Akhsher Apoorva for editing the English translation of the write up.

Mr. Manaswi Sharma for the technical support including video editing.


Nirupa Roy On YT Channel BHD



Jeevan Ki Veena Ka Taar Bole”- Nirupa Roy    

   ............Shishir Krishna Sharma

Whenever one mentions a mother in Hindi Cinema, the first face that comes to mind is Nirupa Roy. Though the audiences of 1970’s and 1980’s might associate Nirupa Roy’s image with that of a filmi mother but patrons of the golden era of Hindi cinema are well versed with the fact that this actress started her career as a heroine and that she was one of the very successful heroines of her time. And not just that, tremendous hits like ‘jeevan ki veena ka taar bole’, ‘aa laut ke aaja mere meet’, ‘zara saamne to aao chhaliye’, ‘mera chhota sa dekho ye sansaar hai’, ‘chaahe paas ho chaahe door ho’, ‘dhalti jaaye raat’, ‘kyon mile tum humand mai yahaan tu kahaan mera dil tujhe pukaare were filmed on none other than Nirupa Roy

I met Nirupa Roy at her house in Embassy Apartment situated on South Mumbai’s Nepean Sea Road. A big apartment made by joining 3 flats on the ground floor, a big lawn behind the house adjoining the Arabian sea, beautiful marble sculptures bedecking the lawn, 4 hours spent in tête-à-têtes, time just flew by. Nirupa Roy was born on 4th January 1931 in Gujarat’s Valsad city to a traditional Guajarati Chauhanfamily. Her father used to work in railways and other than her parents, the family was completed by Nirupa Roy and her sister. Nirupa Roy’s real name was Kanta but her parents used to lovingly address her as Chhibi. While she was studying in school during 1945, at the tender age of 14 years she was married off and from Kanta Chauhan she became Smt. Kokila Balsara and went to Mumbai. Her husband Kamal Balsara was working as a Rationing Inspector and aspired to be an actor, a desire that couldn’t find fulfillment.

According to Nirupa Roy, her marriage was just 3-4 months old when her husband saw an advertisement by Sunrise Pictures looking for a fresh face for their Gujarati film ‘Ranakdevi’, for which he promptly applied. When he was called for an interview, Nirupa Roy also accompanied him. Though her husband was once again unsuccessful in the interview, Nirupa Roy was immediately offered the role of the female lead without an interview. On her husband’s insistence she agreed to do the role however, later on she was given a different and smaller role to play. She was also bestowed with her screen alias ‘Nirupa Roy’ in place of Kokila Balsara by the owner of Sunrise Pictures viz V.M.Vyas. Later on her husband also started using the surname Roy in place of Balsara. The film Ranakdeviwas released in the year 1946.

In those times it was not considered virtuous for people from good families and especially for girls and ladies to work in movies. As soon as news of Nirupa Roy’s involvement in movies spread, her family and the society broke out in a furor. Her father put out the word that if his daughter should work in movies, then, the family would cut all ties from her forever. Nirupa Roy said, “The societal outburst cooled down right after the release of the film Ranakdevi’ but my father held on to his words. He really didn’t see me till his last dying breath. In fact, while he was alive I would meet my own mother clandestinely.

1948’s Gunsundariwas the first Hindi film Nirupa Roy signed under the banner of Ajit Pictures. This bilingual Hindi - Guajarati film’s producer – director was Ratibhai Punatar. Beautifully composed by 3 composers, Bulo C.Rani, Hansraj Behl and Avinash Vyas, the films hero opposite Nirupa Roy was Manhar Desai. But her first released Hindi film was Sardar Chandulal Shah’s companyRanjit Movietones’ Lakhon Me Ek’ (1947) which she had signed after Gunsundari. Directed by Taimur Bairamshah and composed by Hansraj Behl and Bulo C.Rani, Nirupa Roy’s lead in the movie was Pakistani actorKamal. Sardar Chandulal Shah was Ratibhai Punatar’s maternal uncle.

Nirupa Roy had said, “In those days mythological, historical and social films had their own set of actors but I had become busy within all movie genres. I did almost 50 mythological films like Har Har Mahadev (1950), Shiv Shakti (1952), Naag Panchmi (1953), Shiv Kanya (1954), Sati Madalsa (1955), Sati Naag Kanya (1956) and Chandi Pooja (1957) where I was cast opposite actors like Mahipal, Manhar Desai, Sahu Modak and Trilok Kapoor and I potrayed many mythological roles like Seeta, Savitri, Damyanti. I did 10 historical films like Amar Singh Rathore (1957), Samrat Chandragupt (1958), Kavi Kalidas (1959), Rani Roopmati (1959), Veer Durgadas (1960) and Razia Sultan (1961) as a heroine with Jairaj and Bharat Bhushan”

Nirupa Roy was also equally liked in social films like Hamari Manzil (1949), Mann Ka Meet (1950), Bhagyawaan (1953), Dharm Patni (1953), Do Beegha Zameen (1953), Garam Coat (1955), Janam Janam Ke Phere (1957), Kangan (1959), Heera Moti (1959), Bedard Zamana Kya Jaane (1959) and Ghar Ki Laaj (1960). Most of her films as a leading lady were made in the 1950’s decade. She was seen essaying a character role for the first time in the 1956 release film Bhai-Bhai. She has played the role of Ashok Kumar’s wife in the movie and both Ashok Kumar and Kishore Kumar acted together in the same movie for the first time.

According to Nirupa Roy, “For the 1955 film ‘Munimji’, I had accepted the role of portraying the heroines’ journey, from her youth to old age, as a challenge. I had completed the shooting of the film but I just didn’t realize when my scenes where I was playing a youth were cut and I was replaced in those scenes by Nalini Jaywant. I was so shaken up by this foul play that even receiving Filmfare’s Best Supporting Actress Award couldn’t lessen my pain. I even tried to change my mythological and historical film’s image by doing a couple of stunt films like Sindbad-The Sailor (1952) and Baazigar (1959) but, the audience couldn’t accept ‘Devi’ in such aggressive roles. In retaliation I got so many hate mails that I didn’t have the courage to attempt stunt films again in the future.”

Towards the beginning of the 1960’s decade, Nirupa Roy had become a full-fledged character artist. She received Filmfare’s ‘Best Supporting Actress Awards’ for her roles in films Chhaya (1961) and Shehnai (1964). She essayed the role of a mother in many films like Chand Aur Sooraj (1965), Aaya Sawan Jhoom Ke (1969), Aan Milo Sajna (1970) and Chhoti Bahu (1971). But after the 1975 hit film Deewar, wherein she played Amitabh Bachchan and Shashi Kapoor’s mother, she was firmly established as a ‘Filmi Mother’.

According to Nirupa Roy, “I played a mother to many big stars in many a films like Maa (1976), Amar Akbar Anthony (1977), Muqaddar Ka Sikandar (1978), Suhaag (1979), Gautam Govinda (1979), Kartavya (1979), Ganga Meri Maa (1982), Ganga Jamuna Saraswati (1988), Ganga Tere Desh Me (1988) but I was especially identified as Amitabh Bachchan’s reel mother. I kept busy with acting till the middle of the 1980’s decade. And then slowly work started to decline. Made in 1999 films Laal Badshah, Love You Hamesha and Jahan Tum Le Chalo are my last releases. I played Jimmi Shergill’s paternal grandmother in the film Jahan Tum Le Chalo.

Nirupa Roy was honored with the Filmfare Lifetime Achievement Award in 2004. In a career spanning 55 years, she acted in almost 300 Hindi and 16 Gujarati films. Her immediate family consists of her husband Kamal Roy, 2 sons Yogesh and Kiran and a granddaughter and a grandson. She has also raised her sister-in-law’s daughter Rekha as her own and has gotten her married. Rekha Parmar stays in London with her husband.

Nirupa Roy passed away on 13th October 2004 at the age of 73 due to a heart attack.